Badrinath Dham

 

ब्रह्मकपाल तीर्थ

अति गुह्यमिंद तीर्थ सुरासुर नमस्कृतम्।
ब्रह्महाऽपित नरोयत्र स्नान मात्रेण शुद्धयति।।

एक बार किसी कारण वश भगवान शंकर ने ब्रह्मा का सिर काट डाला जिससे क्रोधिक ब्रह्मा ने भगवान शिव को शाप दिया और भगवान शंकर ब्रह्महत्या के पाप से शापित हो गये।  तब भगवान शंकर से ब्रह्महत्या का पाप छूटा ही नहीं और ब्रह्मा का शीश शिव के हाथ से चिपका ही रहा, जब तीनों लोकों में ब्रह्महत्या के शाप से शापित शिव घूम रहे थे और उन्हें इस पाप से मुक्त होने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था तब से घूमते हुए श्री बदरिकाश्रम में आये तो अचानक इस स्थान पर उनके हाथ से ब्रह्मा का सिर छूट गया और वे ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो गये। तब से इस स्थान को कपाल मोचन तीर्थ या ब्रह्मकपाली के नाम से जाना जाता है शिवजी के हाथ में ब्रह्माजी का कपाल क्यों आ गया।  इस सम्बन्ध में अनेक पुराणों में भिन्न भिन्न अनेक कथायें हैं।   

पद्मपुराण में नरोत्पत्ति को बड़ी ही अदभुत और मनोरंजक कथा है।  बात यह हुई कि ब्रह्माजी के पंचम मुख के तेज से देवताओं का तेज हत हो गया।  इस पर सब देवता मिलकर शिवजी के पास गये।  सब हाल कह सुनाया।  शिवजी को आया रोष और उन्होंने ब्रह्माजी के पंचम सिर को नख से काट लिया।  और वह हाथ में चिपक गया।

समासेन हि कथ्यन्ते सर्वकामप्रदानि वै। ब्रह्मकपाले पितरः प्रेक्षमाणाः स्ववंशजम्।।
तिष्ठन्ति तस्मात्पिण्डानां प्रदानं मुनयोऽब्रुवन्। अज्ञानात्ज्ञानतो वापि भक्त्याऽभक्त्याथवा पुनः।।
कृतं तत्सर्वमेवाशु कोटिकोटिगुणं भवेत्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कुर्यादत्र सुतर्पणम्।।

ब्रह्मकपाल में पितर अपने वंशज की प्रतीक्षा करते रहते हैं।  इसलिए वहाँ पिण्डदान करना चाहिए, ऐसा मुनियों ने कहा है।  ज्ञान से अथवा अज्ञान से और भक्ति से अथवा अभक्ति से जो यहाँ पिण्ड चढ़ाते हैं और जल से तर्पण करते हैं, उनके पापी और दुर्गति को प्राप्त पितर भी तर जाते हैं। जिन मनुष्यों ने ब्रह्मकपाल में पितरों को उद्देश्य करके तपर्ण कर लिया है। (ब्रह्मकपाल) में किया गया सभी कर्म कोटिकोटि गुण अधिक फल देता है।  इसलिए सब प्रयत्न से यहाँ अच्छी तरह तर्पण करना चाहिए। यहाँ पिण्ड चढ़ाते ही पितरों को मुक्ति मिल जाती है। जो कोई माता के कुल में उत्पन्न हुए हों, जो पिता के वंश में उत्पन्न हुए हों साले हों, सम्बन्धी हों, मित्र हों, उन्हें भी वहाँ पिण्ड चढ़ाने से वे परम स्थान अर्थात् विष्णु के परम पद को प्राप्त कर लेते हैं।  जिनको उद्देश्य करके वहाँ जल तथा पिण्ड दिये जाते हैं, वे स्मरण से भी विष्णुलोक को चले जाते हैं।  पितर लोग नित्य कहा करते हैं कि मेरे वंश का कोई उत्तम व्यक्ति बदरी विशाल जायेगा तो हमें तार देगा।  सैकड़ों वर्षों में भी वहाँ का माहात्म्य कौन कह सकता है। जहाँ महाभाग गंगा बदरीश से शोभित है और शिलारूपी नृसिंह भी गंगा में विद्यमान हैं, वहाँ नारायण कुण्ड भक्तिमुक्तिदायक है।  इस श्रेष्ठ स्थान को परमेश्वरी श्रीविष्णु चारों युगों में नहीं छोड़ते हैं, यह बिलकुल सत्य है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

यहाँ ऐसी प्रसिद्धि है कि बदरी क्षेत्र में श्राद्ध करने के अनंतर फिर कभी श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं।  गया जी में श्राद्ध करने का सब से श्रेष्ठ फल बताया है, किन्तु यहाँ बदरिकाश्रम में गया से भी अष्ट गुण फल होता है।  इसलिये जो यात्री बदरीनाथ जाते हैं, वे यहाँ श्राद्ध अवश्य करते हैं।  गृहस्थियों को यहाँ अवश्य श्राद्ध करना चाहिए।