Badrinath Dham

 

स्वर्गारोहिणी - चतुर्वेद धारा - शेषनेत्र


स्वर्गारोहिणी -

श्री बदरीनाथ धाम से 24 किलोमीटर उत्तर में सतोपंथ झील है, इससे आगे स्वर्गारोहिणी की सीढ़ियां प्रारम्भ हो जाती हैं।  इसी स्थान से धर्मराज युधिष्ठिर दिव्य विमान में बैठकर सशरीर स्वर्ग चले गये थे।  इस स्थान की यात्रा कठिन हैं, लेकिन श्रद्धालु भक्तजन इस दिव्य स्थल के दर्शनों के लिए आज भी जाते रहते हैं।  वास्तव में स्वर्गारोहिणी धरती पर आध्यात्म का चरम शिखर स्थल है।  इस स्थान पर लोगों को दिव्य आध्यात्मिकता की अनुभूति होती है।  कई दिव्य संत यहां आज भी तपस्यारत हैं।

स्वर्गारोहिणी

चतुर्वेद धारा -

अनुक्रमेण तिष्ठन्ति वेदाश्चत्वार एव च।
ऋग्यजुःसामाथर्वाख्या भगवत्पार्श्ववर्तिनः।
(स्क0 पु0 व0 अ0 34 श्लो0)

चरों वेद ऋग, यजु, साम और अथर्व इस क्रम से भगवान के समीप ही रहते हैं, धार रूप से बहते हैं।

दूर से ही नर पर्वत से सर्प की तरह वक्रगति से इठलाती हुई चिल्लाती और भागती हुई चार धाराएँ दिखाई देती है।  ये चारों वेदों की धारायें है। चारों वेद यहाँ धारा होकर क्यों बहने लगे, इस सम्बन्ध में एक पौराणिक गाथा है।

जब ब्रह्माजी के मुख से निसृत वेदों को मधुकैटम दैत्य हर ले गये, तब भगवान ने हयग्रीवावतार लेकर उस दैत्य से वेदों को लाकर ब्रह्माजी को दिया।  बदरिकाश्रम की ऐसी महिमा देख कर देवों ने और ब्रह्माजी ने उस स्थान को छोड़ कर ब्रह्मलोक जाने की इच्छा ही न की। वेद और ब्रह्माजी से ही तो सृष्टि है, यदि ये ही दो यहाँ रह गये तो सृष्टि का तो काम रूक जायगा।  इसलिये सिद्धों ने आकर इनकी स्तुति की।  वेदों ने अपने दो रूप बनाये।  एक रूप से तो वे ब्रह्मा जी के साथ ब्रह्मलोक चले गये और एक रूप से धारा होकर यहाँ रहने लगे।  जो इनके दर्शन स्पर्श, पूजन तथा इनमें स्नान करते हैं, उनके सब पाप छूट जाते हैं-

द्रवरूपेषु वेदेषु स्नान-दान-तपः क्रियाः।
कृता विच्छेदिता न स्युर्यावदाभूतसंप्लवम्।।

(स्क0 पु0 व0 6 अ0 32 श्लोक0)

शेषनेत्र -

यहाँ शेषजी के नेत्रों के चिन्ह एक शिला पर बने हुये हैं।  यहाँ से बदरीपुरी की शोभा बड़ी ही निराली दिखाई देती है।

भगवान नारायण ही हैं तथा नारायण की प्राप्ति ही सर्वोत्तम गति हैं।  सत्य के परम लक्ष्य नारायण ही हैं।  ऋतु नारायण का ही स्वरूप हैं।  जिसके आचरण से पुनर्जन्म की प्राप्ति नहीं होती, उस निवृत्ति प्रधान धर्म के भी चरम लक्ष्य भगवान नारायण ही हैं।  प्रवृत्ति रूप धर्म नारायण का ही स्वरूप है। श्रेष्ठतम गुण-गन्ध भी नारायण ही हैं।

विशाला बदरी यत्र नर-नारायणाश्रमः।
तं सदाध्युषितम यक्षौद्रक्ष्याक्यों गिरिमुत्तम्।।
(महाभारत वनपर्व- 141/23-25)