Badrinath Dham

 

भगवान नर-नारायण

धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ठ मूत्र्या।
नारायणो नर ऋषिप्रवरः प्रशान्तः।
नैष्कम्र्य लक्षणामुवाच चचारकर्म
योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्य निषेवितांघ्रिः।।

जो भारत का शिरोमुकुट है, जो समस्त पर्वतों का पति होने से गिरिराज कहलाता है उसी के एक उत्तुंग शिखर के प्रांगण में बद्रिकाश्रम या बदरीवन है।  इन चर्म चक्षुओं से न दीखने वाला, वह एक उसी तरह बदरी का विशाल वृक्ष है, जिस प्रकार प्रयाग में अक्षयवट है।  बदरी वृक्ष में लक्ष्मी का वास है, इसीलिये लक्ष्मीपति को यह दिव्य वृक्ष अत्यन्त प्रिय है।  उसकी सुखद शीतल छाया में भगवान् ऋषि मुनियों के साथ सदा तपस्या में निरत रहते हैं।  बदरी वृक्ष के कारण ही बदरी क्षेत्र कहलाता है और नर-नारायण का निवास स्थान होने से इसे नर-नारायण या नारायणाश्रम भी कहते हैं।

सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्र उत्पन्न किये।  ये संकल्प से ही अयोनिज उत्पन्न हुए थे, इसलिये ब्रह्मा के मानस पुत्र कहाये।  उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद है।  इनके द्वारा ही आगे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई।  इसके अतिरिकत ब्रह्माजी के दायें स्तन से धर्मदेव उत्पन्न हुए और पृष्ठ भाग से अधर्म।  अधर्म का भी वंश बढ़ा उसकी स्त्री का नाम मृषा (झूठ) था, उसके दम्भ और माया नाम के पुत्र हुए।  उन दोनों से लोभ और निकृति (शठता) ये उत्पन्न हुए, फिर उन दोनों से क्रोध और हिंसा दो लड़की लडके हुए।  क्रोध और हिंसा के कलि और दुरक्ति हुए।  उनके भय ओर मृत्यु हुए तथा भय मृत्यु से यातना (दुख) और निरय नरक ये हुए।  ये सब अधर्म की सन्तति है।  ’’दुर्जनं प्रथम बन्दे सज्जनं तदनन्तरम्’’ इस न्याय से अधर्म की वंशावली के बाद अब धर्म की सन्तति -

ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह मनु पुत्री प्रसूती से हुआ।  प्रसूति में दक्ष प्रजापति ने 16 कन्यायें उत्पन्न की।  उनमें से 13 का विवाह धर्म के साथ किया।  एक कन्या अग्नि को दी, एक पितृगण को, एक भगवान् शिव को।  जिनका विवाह धर्म के साथ हुआ उनके नाम - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति।

धर्म की ये सब पत्नियाँ पुत्रवती हुई।  सबने एक एक पुत्र रत्न उत्पन्न किया।  जैसे श्रद्धा ने शुभ को उत्पन्न किया, मैनी ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को उन्नति ने दर्प को, पुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, और ही (लल्जा) ने प्रश्रय (विनय) को और सबसे छोटी मूर्ति देवी ने भगवान् नर-नारायण को उत्पन्न किया।  क्योंकि मूर्ति में ही भगवान् की उत्पत्ति हो सकती है।  वह मूर्ति भी धर्म की ही पत्नी है।

नर-नारायण ने अपनी माता मूर्ति की बहुत अधिक बड़ी श्रद्धा से सेवा की।  अपने पुत्रों की सेवा से सन्तुष्ट होकर माता ने पुत्रों से वर माँगने को कहा।  पुत्रों ने कहा-’’माँ, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो वरदान दीजिये कि हमारी रूचि सदा तप में रहे और घरबार छोड़कर हम सदा तप में ही निरत रहें।’’ माता को यह अच्छा कैसे लगता कि मेरे प्राणों से भी प्यारे पुत्र घर-बार छोड़कर सदा के लिये वनवासी बन जायँ, किन्तु वे वचन हार चुकी थी।  अतः उन्होंने अपने आँखों के तारे आज्ञाकारी पुत्रों को तप करने की आज्ञा दे दी।  दोनों भाई बदरिकाश्रम में जाकर तपस्या में निरत हो गये।

बदरिकाश्रम में जाकर दोनों भाई घोर तपस्या करने लगें  इनको तपस्या की क्या जरूरत थी, किन्तु लोक शिक्षा के लिये अपने आप ही अपना भजन करने लगें,  इनकी तपस्या के सम्बन्ध में पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथायें हैं।

श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है।  देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है।  वहाँ पर हरि, कृष्ण, नर और नारायण ये चार भाई बताये है।  हरि और कृष्ण तो पहिले ही घर छोड़कर तपस्या करने चले गये थे।  नर-नारायण रह गये थे।  उन्होंने भी माता से तपस्या करने का वरदान प्राप्त किया और ये तपस्या करने के लिये नैमिषारण्य क्षेत्र को चले गये।