Badrinath Dham

 

पंचरात्र प्राप्ति की कथा

यदिदं पञरात्र में शास्त्रं परमदुर्लभम्।
तद्भवान् वेत्स्यते सर्व मत् प्रसादान्न संशयः
(बराह पु0 66 अ0 18 श्लो0)

इस सम्बन्ध में एक बडी ही रोचक कथा है।  एक बार नारद जी ,बद्रिकाश्रम में भगवान् के दर्शन नहीं हुए तब वे बड़ी चिन्ता में पड़े।  इधर-उधर भगवान को खोजने लगे।  खोजते-खोजते ये सुमेरू पर्वत तक निकल गये।  किन्तु भगवान के दर्शन वहाँ भी न हुए।  नारदजी को बड़े जोर की प्यास लगी।  इतनी प्यास लगी कि प्राण व्याकुल होने लगे।  वहाँ उन्हें दूर से एक कुटी दिखाई दी।  नारदजी को कुछ आशा हुई। सचमुच वहाँ जाने पर एक तपस्वी दिखाई दिया।  नारदजी ने बड़ी आकुलता से कहा-’’बाबा थोड़ा जल पिला दो तो प्राण बचें।  यह सुनते ही उन तपस्वी जी ने पास में ही प्रहार किया।  वहाँ की जमीन फट गई और एक बहुत बड़े चौड़े बर्तन को पकड़े हुए सहस्त्रों अप्सरायें निकलीं।  निकलते ही उन अप्सराओं ने कहा-’’ब्रह्मन! आप पहिले स्नान कीजिये तब जलपान कीजिये। वे चिन्ता में पड़े स्नान कैसे करूँ।  तब उन अप्सराओं ने कहा-’’ब्रह्मन्! आप इसी पात्र में गोता लगाइये।’’

नारदजी सोचने लगे-’’यह पात्र चौड़ा तो बहुत है, किन्तु इस परात में मैं स्नान कैसे करूंगा।  उनकी चिन्ता को समझकर वे अप्सरायें बोलीं -’’हे देवर्षे! आप चिन्ता न करें आप इसमें प्रवेश तो कीजिये।’’ अब नारदजी क्या करते अपने दंडकमंडल रखकर उसमें उतरें। नारदजी बिना प्रयास के उसमें घुसे ही जा रहे थे।  बड़ी देर के पश्चात् वे एक बड़े ही सुन्दर नगर रमणीक देश में पहुँच गये।  वहाँ की शोभा वर्णनातीत थी।  दिव्य सुवर्णों के महल बने है।  पूछने पर पता चला वह श्वेत द्वीप है।  श्वेत द्वीप में पहुँकर नारदजी ने देखा वहाँ के सब लोग चतुर्भुज हैं।

नारदजी जिसे ही देखते उसे ही विष्णु समझकर प्रमाण करते।  वे कह देते-’’विष्णु भगवान् का भवन तो आगे है।’’ नारदी जी आश्चर्य चकित थे।  चलते-चलते वे श्रीहरि के श्वेत द्वीप के वेकुण्ठ धाम में पहुँचे।  वहाँ उन्होंने शेषशायी भगवान् का श्रीमन्नायण के दर्शन किये।  भगवान् के दर्शनों के अनन्तर नारदजी ने उनकी पूजा स्तुति की।  उनकी पूजा स्तुति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने उनसे वर-दान माँगने को कहा।  नारदजी ने कहा-’’हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, जिस पूजा पद्धति से आपकी प्राप्ति हो उसे आप मुझसे कहें।’’ भगवान् ने उन्हें पूजापद्धति बताई और कहा-वेद शास्त्रों के नियमों से पञरात्र विविध से जो मेरी पूजा करते हैं उन्हें मेरी प्राप्ति होती है।  यह पूजा द्धिजों के लिए ही है, शूद्र आदि द्विजेतर जातियों के लिए तो मेरे क्षेत्रों की तीर्थयात्रा और मेरे नामों का जप कीर्तन ही श्रेष्ठ साधन हैं।’’

अलाभे वेदशास्त्रणां पञारात्रोंदितेनहि।
मार्गेणमां यजन्तेयेते मां प्राप्स्यन्तिमानवा,
ब्राह्मिणाक्षत्रिय विशांपञरात्रं विधीयते
सूद्रादीनांतुमे क्षेत्र पदवीगमतंद्विज!
मन्नाग विहितंतेषां नान्यत पूजादिकं चरेत्

(बराह. पु. 66 अ. 11-12, 13 श्लो0)

नारद जी ने इस प्रकार पंचरात्र पूजा पद्धति का उद्देश्य ग्रहण किया।  देखते हैं तो उनके दण्ड कमण्डलु वहीं रखे हैं।  और वे अप्सरायें वहीं खड़ी हैं।  वे बाबा जी चतुर्भुज रूपधारी साक्षात् श्रीमन्नारायण ही हैं।  उनकी पूजा करके नारद जी ने इसका रहस्य पूछा तो भगवान् ने कहा-श्वेत द्वीप में तुमने जिस रूप के दर्शन किये हैं वह मेरा ही रूप हैं, मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं।  मैंने तुम्हें पूजा पद्धति का उपदेश ग्रहण करने ही भेजा था।  तुम इसी पूजा पद्धति से मेरी अर्चना करो।  तब से नारद जी उसी रूप को उसी पद्धति से सेवा पूजा करने लगे।  नारद जी पंचरात्रि वहाँ रहे इसलिये इसका नाम पांचरात्रि पड़ा।