Badrinath Dham

 

श्री शंकरार्य और श्री बदरीनारायण


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श्रुतिस्मृति पुराणातमालयं करूणालयम्।
नमामि भगवत्पादं शंकरं लोक शंकरम्।।

यह बात सर्व श्रुत निर्विवाद है कि स्वामी आदि शंकराचार्य द्वारा श्री बदरी नाथ मन्दिर की पुनः प्रतिष्ठा या जीर्णोद्वार हुआ है।  स्कन्द पुराण में स्पष्ट ही लिखा है कि कलियुग में यति रूप से मैं नादर कुण्ड से भगवान् की मूर्ति को निकाल कर स्थापित करूँगा।

आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारत में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया और भारत में चार कोनों पर चार मठों की स्थापना की।

भारतीय संस्कृति के विकास में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान रहा है। आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि ई. सन् ७८८ को तथा मोक्ष ई. सन् ८२० स्वीकार किया जाता है, परंतु सुधन्वा जो कि शंकर के समकालीन थे, उनके ताम्रपत्र अभिलेख में शंकर का जन्म युधिष्ठिराब्द २६३१ शक् (५०७ ई०पू०) तथा शिवलोक गमन युधिष्ठिराब्द २६६३ शक् (४७५ ई०पू०) सर्वमान्य है।

बदरीनाथ का अर्चक आज पर्यन्त भी श्री शंकराचार्य की नम्बूद्री जाति में से ही आता है।

श्री शंकराचार्य-द्वारा स्थापित चार मठ बातये जाते हैं।  उनके प्रधान चार शिष्य थे उन चारों को उन मठों का आचार्य या मठाधीश बनाया गया।  पहला शारदा मठ (द्वारिका में) इनके आचार्य हस्तामलक स्वामी बनाये गये।  दूसरा गोवर्धन मठ (जगन्नाथपुरी) इसके आचार्य पदम्पाद स्वाम हुए।  तीसरा ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) इसके आचार्य तोटक स्वामी हुए और चैथा श्रृंगेरीमठ (रामेश्वर) इसके आचार्य सुरेश्वर स्वामी हुए।  इस प्रकार इन चारों मठों की स्थापना श्री स्वामी शंकराचार्य के समय में ही हुई है और ये चारों आचार्य भगवान शंकराचार्य के प्रधान सौर प्रसिद्ध शिष्य हैं जिनकी स्तुति शंकर सम्प्रदाय के प्रत्येक मठ मन्दिर में आज तक नित्यम प्रति होती आ रही है।

श्री शंकराचार्य विरचित एक मठाम्नाय ग्रन्थ मिलता है।  जिनमें चारों की मठों की व्यवस्था तथा नियम आदि का वर्णन है।  प्रत्येक मठ के नाम, सम्प्रदाय, पद क्षेत्र, अधिष्ठातृ, देवी देवता, आचार्य तीर्थ ब्रह्मचारी की उपाधि, वेद, महावाक्य गोत्र तथा अधीनस्थ देशों के नाम-आदि का पृथक-पृथक निर्णय है।  इन चारों मठों में से तीसरा मठ ज्योतिर्मठ या जोशीमठ है।  जो बद्रीनाथ के समीप अब भी इसी नाम का एक नगर हैं

आज भी चार ताम्र पत्र अब तक पांडुकेश्वर मन्दिर में रखे हुए हैं।  उनके अक्षर तो पाली भाषा से मिलते जुलते हैं, किन्तु भाषा संस्कृत है (1) पहिला ताम्र पत्र पद्मटदेव कुशली का लिखाया हुआ है जो टंकणपुर का राजा था।  जो वर्द्धमान् विजयराज सम्वत् 25, ज्येष्ठ वदी 5 को लिखा गया है।  (2) तीसरा श्रीमद् ललित सूरदेव कुशली का है, जिसकी राजधानी कर्तिकेयपुर थी।  वह वर्द्धमान् विजयराज सम्वत् 22 का है।  (3) तीसरा पत्र भी श्रीमद् ललित सूरदेव कुशली का ही लिखा हुआ है, जो बर्द्धमान विजयराज सम्वत् 21 माघ वदी 3 का लिखा है।  इसमें श्यामादेवी की भूमि दान दी गई है। 

(4) चैाथा पत्र राजा सुभिक्षराज का है, जिसकी राजधानी सुमिभक्षपुर थी यह वर्द्धमान् विजयराज सम्वत् 4 का लिखा हुआ है।  इन पत्रों की भाषाशैली वही बौद्धकालीन है।


स्थान-स्थान पर वैदिक धर्म की उन्नति के लिये मठ बनाये।  मन्दिरों को प्रेरणा करके उनसे मन्दिर मठों में गाँव बसवाये हैं।

Pawan Mand Sugandh Sheetal Hem Mandir Shobhitam ,Neekat Ganga Bahut Nirmal ,Shri Badri Nath Vishwambharam ....