Badrinath Dham

 

आदि केदार-नाथ

श्री तत्र केदार रूपेण ममलिड़ प्रतिष्ठितम्।
केदार दर्शनात् स्पर्शा दर्शनात् भक्तिभावतः।।
कोटि जन्मकृतं पापं भस्मी भवति तत्क्षणात्।
कलामात्रेण तिष्ठामि तत्र क्षेत्रे विशेषतः।।

(श्री स्क0 पु0 व0 2 अ0 13-14 श्लो0)

श्री शिवजी स्कन्दजी से कहते हैं-’’हे पुत्र! श्री बदरीवन में मेरा केदार नामक लिंग प्रतिष्ठित है।  जो उस केदारलिंग के भक्तिभाव से दर्शन, स्पर्श तथा पूजन करते हैं उनके करोड़ों जन्म के पाप उसी क्षण नाश हो जाते हैं।  उस क्षेत्र में विशेष कर कलामात्र से ही रहता हूँ।

आदि केदार-नाथ के सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा है। असल में तो यह क्षेत्र शिवजी का ही हैं,  विष्णु भगवान ने तो यहाँ चालाकी से कब्जा कर लिया है।  इस खंड का नाम केदार खण्ड ही है।  हिमालय के पाँच खण्ड बताये हैं।

खण्डा पश्च हिमालयस्थ प्रोक्ता नैपाल कूर्माचलौ।
केदारोऽथ जलंधरोथरूचिरः काश्मीर संज्ञाऽन्तिमः।।

(1) नैपाल (2) मूर्माचल (कूमायूँ) (3) केदार खण्ड (गढ़वाल) (4) जालन्धर (कोट कांगड़ा आदि) और (5) काश्मीर था।  इसलिये पहिले इन सब अखण्ड पर शिवजी का ही आधिपत्य था।  विष्णु भगवान। को यह क्षेत्र बड़ा अच्छा लगा।  अब सोचने लगे किसी तरह इस पर चालाकी से कब्जा करना चाहिये।  वैसे तो शिवजी इसे देंगे नहीं। बस एक छोटे बालक का रूप बनाकर शिवजी के दरवाजे पर जोर जोर से रोने लगे।  शिवजी पार्वती जी के साथ अलकनन्दा में स्नान करने के लिये निकले।  देखा तो बालक रो रहा है।  शिवजी तो समझ गये यह बालक साधारण बालक नहीं है। इसलिये वे तो चुपचाप आगे बढ़ गये, किन्तु पार्वती जी भला कैसे उपेक्षा कर सकती हैं।  माता का हृदय तो दया से परिपूर्ण होता है।  सन्तान के रूदन को सुनकर माँ का हृदय पिघलने लगता है।  पार्वतीजी ने शिवजी को रोककर कहा- यह बालक कैसा रो रहा है, पता नहीं किस वज्र हृदय माता ने इस फूल से नन्हें बालक को यहाँ अकेला छोड़ दिया है।’’

शिवजी ने उपेक्षा के साथ कहा- यह तो संसार है कोई रोता है, कोई हँसता है। भला माँ, जननी कब मानने वाली थीं उन्होंने बड़ी दीनता से कहा- कैसा भोला बालक है बरफ में ठिठुर रहा हैं।  इसे आप आश्रय दीजिए।

शिवजी ने हँसकर कहा-’’यह बालक नहीं बड़ा मायावी है।  सब दया माया भूल जाओगी।  जहाँ तुमने इसे उठाया कि बस फिर सब जगह कब्जा कर लेगा। इसका रोना सच्चा नही।  बनावटी हैं, मत फँसो।
पार्वतीजी कब मानने वाली थीं।  वे बोली-’’नहीं महाराज! चाहे जो हो मैं तो इस बालक को आश्रय दूँगी ही।’’

शिवजी हँस पड़े।  भगवान् की इच्छा को कौन मिटा सकता है।  बोले-’’तुम्हारी इच्छा, उठा लो किन्तु मैं कहता हूँ तुम पछताओगी।’’ पार्वतीजी ने नहीं माना।  बच्चे को उठाकर बड़ी सावधानी से घर मे सुला आई और फिर गंगा स्नान को चली आई।  बस, इतने में ही भगवान ने पूरे घर पर दखल जमा लिया।  पार्वतीजी चकित रह गई।  शिवजी हँस पड़े।  बोले क्यों?  देखी इस बालक को चालबाजी।  अच्छा, अब ये यहीं रहें हम अपना अडडा दूसरी जगह जमावेंगे।’’ यह कहकर शिवजी पास ही ढाई योजन की दूरी पर दूसरे पहाड़ की चोटी पर जाकर रहने लगे जो ’केदारनाथ’ के नाम से विख्यात है। एक किंव-दन्ती हैं, कि पहिले बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री तथा यमुनोत्री का एक ही पुजारी रहता था।  उसे ऐसी शक्ति प्राप्त थी कि वह चारों जगह एक दिन में पूजा कर आता था।  एक दिन जाते समय रास्ते में उसने कुछ खा लिया।  जूठा मुँह जाने से और लोलुपता करने से उसकी वह शक्ति नष्ट हो गई और तब से चारों धाम के पृथक पृथक पुजारी नियुक्ति हुए।

शिवजी तो गये, किन्तु अंश रूप से यहाँ भी रहते हैं।  जो आदि केदार के नाम से विख्यात है। आज भी श्रावण के दिनों में आदि केदार जी की मूर्ति जब स्थल कमलों से सुसज्जित की जाती है, और पंडितगण उनकी वेदमंत्रों से पूजा करते हैं उस समय का दृश्य बड़ा ही मनोहर होता है-

कर धृत जपमालाः शान्ति सन्तोष भाजः।
कृतनति परनित्य प्रार्थनाचन्द्र मौलौ।।
हर चरण सरोज ध्यान विज्ञान मूर्ति।
व्यथित जन मनोजाः सर्वभावान्नितान्तम्।।

(स्क0 पु0 व0 2 अ0 19 श्लो0)

Pawan Mand Sugandh Sheetal Hem Mandir Shobhitam ,Neekat Ganga Bahut Nirmal ,Shri Badri Nath Vishwambharam ....