Badrinath dham

 

अग्नितीर्थ (तप्त कुण्ड)

वहितीर्थ परि भ्राजद भगवन्चरणान्तिके।
केदाराख्यं महालिग्न दृष्ट्वानो जन्म भाग्भवेत्।।

(स्क0 पु0 व0 2 अ0 21)

यह परम पावन तीर्थ है।  इसके महात्म्य के बारे में लिखा है, कि जैसे सुवर्ण में कितना मैल क्यों न भरा हो जैसे वह सोना अग्नि में पड़ने से पवित्र हो जाता है, उसी प्रकार कितना भी पापी क्यों न हो इस अग्नि कुण्ड में स्नान करने से उसके सब पाप धुल जाते हैं।  यह पापनाशक तप्त कुण्ड अत्यन्त महिमा युक्त है-

ततः प्रभृति भूताम्का पावकः सर्वतो भृशम्।
कलयाऽवस्थितताश्रऽत्र सर्वदोषविवर्जितः।।

(स्कन्द0 वै0 ब0मा0- 2/42)

अग्नितीर्थ के सम्बन्ध में एक पौराणिक गाथा है। भृगु महर्षि के श्राप के कारण अग्निदेव सर्वभक्षी बन गये थे, अग्नि ने आकर ऋषि मुनियों से प्रार्थना की। ऐसे भृगु महर्षि ने मुझे सर्वभक्षी बना दिया है। सब सुनकर व्यास जी बोले-’’अग्निदेव! मैं तो बद्रीनाथ में ही रहता हूँ।  इसीलिये मैं बदरी विशाल के विशाल प्रभाव को जानता हूँ।  तुम बदरीनाथ धाम में चले जाओ।  वहाँ तुम्हारे सब दोष छूट जायगे।’’

अग्निदेव ने भगवान व्यासदेव की आज्ञा शिरोधार्य की और सीधे बदी आश्रम पहुँचे।  वहाँ जाकर उन्होंने घोर तप किया।  तप से श्री मन्नारायण सन्तुष्ट हुए और अग्नि को दर्शन दिया।  अग्नि ने भगवान की स्तुति की तब भगवान ने वर माँगने को कहा।

अग्नि हाथ जोड़कर बोले-’’प्रभो!  यहीं वरदान हमें दीजिये कि हमारा सर्व भक्षीपन का दोष छूट जाय।’’ भगवान हँसे और बोले-अरे, तुम क्या वर माँगते हो?  तुम्हारा दोष तो क्षेत्र के दर्शन मात्र से ही छूट गया अब तुम निष्पाप हो गये।  अब तुम यहाँ पर आकर यहाँ आने वालों के सब पापों को छुड़ाया करो।
तबसे अग्नि एक रूप से वहीं जलधारा के रूप में रहने लगे।

तप्त कुण्ड का पुराणों में बड़ा महत्व है।  वहाँ दान देने का ब्राह्मण भोजन कराने का अक्षय पुण्य है।  और तीर्थों से वहाँ दान, पुण्य, स्नान, जप, सन्ध्या, देवार्चन का कोणिगुणा फल बताया गया है।  वहाँ के स्नान का फल बताते हुए यहाँ तक कहा है-

चान्द्रायण सहस्त्रैस्तु कृच्छैः कोटि भिरेव च।
यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्स्नानात् वहितीर्थतः।।

(स्क0 पु0)

अर्थात हजारों चन्द्रायण व्रतों से तथा करोड़ो कृच्छ व्रतों से जो फल मिलता है वह फल, अग्नि तीर्थ में स्नान करने से मिलता है। तीर्थों में तीर्थ बुद्धि से ही रहने पर फल होता है।  मनुष्य अजितेन्द्रिय होने से तीर्थों में रहकर पाप करते हैं यह बड़ा अपराध है।  जैसे तीर्थों में पुण्य क्षय होता है वैसे पाप भी क्षय होता है।  दूसरे जगह किया हुआ पाप तीर्थों में नष्ट हो जाता है किन्तु तीर्थों में किया हुआ पाप वज्ऱलेप होता है वह फिर कभी मिटता नहीं।

अग्नितीर्थ के महात्म्य में स्पष्ट लिखा है-

ज्ञानेन मोहवशतः पापं कुर्वति येऽधमाः।
पैशाची योनिमायान्ति यावदिन्द्राश्रतुर्दशः।।
अनाश्रमी चाश्रमी वा यावद देहस्य धारणम्।
न तीर्थे पावके कुर्यात् पातकं बुद्धि पूर्वकम्।।

(स्क0 पु0 व0 3 अ0 11-12 श्लोक)

ज्ञान से या मोह से जो अग्नि तीर्थ में पाप करते हैं, वे तब तक पिशाच योनि को प्राप्त होते है जब तक 14 इन्द्र बदलते हैं।  कल्पपर्यन्त चाहे चाश्रमी हो या यति परमहंस ही क्यों न हो जब तक देह रहे तब तक अग्नि तीर्थ में कभी-कभी बुद्धिपूर्वक पाप नहीं करने चाहिये।