Badrinath Dham

 

अलकनन्दा

सा गन्ध मादन लता कृसुमौघ लक्ष्मीः
स दिव्य तुडं हिमवन्नग श्रृंग पंक्तिः।
गगां च पुष्प सलिला किमुयस्त्रस्म्यं
त्वामागतोऽस्मिशरणं बदवीवनेऽस्मिन्।।

श्री बदरीनाथ की शोभा वही समझ सकता है जिसने कभी सौभाग्य से बदरीनाथ की यात्रा की हो।  वहाँ की पर्वत श्रेणियाँ कितनी रम्य हैं, वहाँ की कल कल नादिनी भगवती अलकनन्दा चपला बाला की तरह कैसी कमनीय क्रीड़ा करती है, वहाँ के प्रत्येक पत्र पुष्प में कैसी दिव्य गन्ध है।  वहाँ के वातावरण में कितनी शान्ति है।

सचमुच बद्रीनाथ में अलकनन्दा गगां दर्शन की ही चीज है।  भगवान ने जब उद्धवजी को बदरिकाश्रम को भेजा तो चलते समय सावधानी के साथ स्पष्ट कह दिया था।  देखना उद्धव! सावधान, तुम अब बदरिकाश्रम चले जाओ।  वहाँ भगवती अलकनन्दा जी बहती हैं जिनके दर्शन मात्र से ही समस्त पाप कट जाते हैं।’’ भगवान ने स्पष्ट कहा-

गच्छोद्धवः मयादिष्टो वदर्यारिव्य ममाश्रमम्।
तत्र मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनैः शुचिः।।
ईक्षयालकनन्दाया विधूता शेषकल्मषः।
वसानो वल्कालन्यड वन्यभुक् सुखनिःस्पृह।

(श्रीभा0 5 स्क0 11 अ0 41-42 श्लो0)

श्री विष्णु के पादप से प्रवाहित हुई पाप नाशिनी त्रिपथगामिनी श्री गंगाजी अलकनन्दा के तो दर्शन मात्र से ही समस्त पाप कट जाते हैं।

कैलासे पर्वते श्रेष्ठे गन्धमादन पर्वते।
बदरीवन मध्ये वै बदरीनायको हरिः।।

गन्धमान्दन पर्वत कैलास श्रृंखला का एक भाग है।  महाभारत, मार्कण्डेय और वाराहपुराण इस पर्वत पर बदरिकाश्रम की स्थिति बतलाते हैं।  मार्कण्डेय और स्कन्दपुराण के अनुसार जिस पर्वत से होकर अलकनन्दा बहती है वही गन्धमादन है।

विभिन्न पुराणों और महाभारत आदि ग्रन्थों में गन्धमादन पर्वत को स्वर्गभूमि कहा है। भारतीय वाङग्मय में पुराणों से लेकर मध्यकालीन और आधुनिक समस्त विद्वानों ने कुबेर की राजधानी इसी बदरीवन गंधमादन को स्वीकार किया है।  देवताओं के स्वर्ग गन्धमादन (अलकापुरी) से निकलने के कारण अलकनन्दा को वेदों में ’देवनदी’ और पुराणों में ’अलकनन्दा’ कहा गया है और आज भी पौराणिक साहित्य के अलावा भूगोल वेत्तओं की दृष्टि में अलकनन्दा बांक ग्लेशियर से निकलती है।

चूंकि यह अलकनन्दा बांक कुबेर की अलकापुरी में स्थित है इसलिए अलकापुरी वांक से निकलने के कारण अलकनन्दा नाम हुआ है। इसी बात को महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्ध मेघदूत में लिखा है कि कैलास में स्थित अलकापुरी एवं अलकापुरी से निकलती हुई भगवती अलकनन्दा जो कि गंगा की मूल धारा है यह श्री बदरिकाश्रम में भगवान नारायण के चरणों का अनवरत अभिषेक करती हुई आगे बढ़ती है इसीलिए गंगा को विष्णुपदी कहा गया है।

इस विष्णुपदी में स्नान और पूजन के माहात्म्य और पुण्य का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।  ब्रह्मपुराण के अनुसार समस्त देवताओं के प्रत्यनों से महर्षि गौतम नामक ब्राह्मण ने गंगा की इस पहली धारा अलकनन्दा को पृथ्वी पर उतारा तथा दूसरी धारा को क्षत्रीय भगीरथ ने उतारा था।

यह बात स्मरण रखने की है, कि समस्त पुराणों ये ही हैं।  जब महाराज भगीरथ को अपने पितरों को नरक से निकालने की आवश्यकता पड़ी तब वह गंगाजी की दूसरी शाखा को लाये जो भागीरथी गंगा के नाम से विख्यात हुई और देवप्रयाग में आकर दोनों बहिनें फिर मिल गई।