Badrinath Dham

 

अत्रि अनसूयातीर्थ - इन्द्र पद तीर्थ या इन्द्र धारा - नाग-नागिन

अत्रि अनसूयातीर्थ -

ब्रह्मकुण्ड से आगे गंगा जी के किनार किनारे ऊपर की ओर जहाँ से आगे गंगाजी मुड़ती हैं।  ठीक गंगाजी के तट पर इस तीर्थ का नाम अत्रि अनुसूया तीर्थ प्रसिद्ध है। वामन पुराण में नरोत्पत्ति प्रकरण में यह कथा आई है, कि जब कपाली शंकर ने, भगवान नारायण से भिक्षा मांगी और उनकी दखिण भुजा को त्रिशूल से ताड़न किया तो उसमें से रक्त की तीन धारायें निकलीं।  एक धारा तो ताराओं से व्याप्त आकाश में चली गई।  जो आकाश गंगा हुई।  दूसरी धारा को तपोधन अत्रि ऋषि ने धारण किया जिसमें शंकर जी के अन्शावतार दुर्वासा मुनि उत्पन्न हुए।  तीसरी कपाल पर पडी जिससे नारायण के सखा नर उत्पन्न हुए।

द्वितीयान्य पतत्भूमौ तांजग्राह तपोधनः।
अस्तिस्मात् समुद्भूतो दुर्वासाः शंकराशतः।।
(वामन पु0 2 अ0 28 श्लोक)

स्थान बड़ा ही शान्त एकान्त दिव्य है।  एकान्त चिन्तन और अनुष्ठानके लिये बहुत ही उपयुक्त है।  श्री बदरीनाथ मन्दिर की ओर से एक सुन्दर कुटी भी बनी है।

अत्रि अनसूयातीर्थ

इन्द्र पद तीर्थ या इन्द्र धारा -

दूर से पहाड़ पर सफेद पारे की तरह गिरती हुई एक वेगवती धारा दिखाई देगी।  उत्तुंगगिरि शिखर के पत्थरों से टकराती हुई वह धारा ऐसी प्रतीत होती है,  मानों पिघली हुई चांदी बह रही हो।  उसे इन्द्र धारा कहते हैं।  यहाँ इन्द्र ने ब्रह्महत्या पाप से मुक्त होने के लिये  तप किया था। यहीं तपस्या करके उन्होंने फिर से इन्द्र पद प्राप्त किया।

ततोऽर्वाग्दिक्षिणे भागे द्रिवधारेतिथिश्रुम्।
तीर्थमिन्द्रिपदं यत्रतपश्चाक्रे पुरंदरः।।
(स्क0 पु0)

  यहाँ पर जप, दान, तप का अनन्त गुणा फल बताया गया है।  किसी भी मास की शुक्ला त्रयोदशी को यहाँ स्नान करके विधिवत वेदाध्ययन करे, विष्णु का पूजन करे और दो उपवास करे तो उसे इन्द्रलोक मिलता है।

नाग-नागिन -

नाग-नागिन

 
यह नाग नागिन का प्राचीन मंदिर है, जहां पर एक पत्थर की शिला के ऊपर नाग नागिन का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है।