Badrinath Dham

 

श्री बद्रीनाथ भगवान् का विग्रह

जन्मान्तरार्जित महादुरितान्तरायं,
लीलावतार रसिकं सुकृतोपलभ्यम्।
ध्यायन्नहो धरणि मण्डन पाद पद्मं,
त्वामागतोऽस्मि शरणां बदरीवनेऽस्मिम्।।

श्री बद्रीनाथ भगवान् का विग्रह एक सालिग्राम शिला के द्वारा प्रकट हुआ है।  समस्त भागवत पुराण सुनाने के अनन्तर भगवान् शुकदेव ने राजा परीक्षित से स्पष्ट कह दिया-

कथा इमास्ते कथिता महीयर्सा
विताय लोकेषु यशः परेयुषाम्
विज्ञान वैराग्य विवक्षया विभो!
वचो विभूतीर्नतु पारमाथ्र्यम्।।
(भाग0 12 स्क0 पु0 3 अ0 14 श्लोक)

भगवान अनादि हैं, उनके नाम, रूप, लीला और धाम भी अनादि हैं।  नर नारायण की लीला भी अनादि है।  यह जो भगवान का विग्रह है जिसकी आज हम लोग बड़ी  श्रद्धा से पूजा करते हैं यह भी अनादि है, और बद्री धाम भी अनादि है।  फिर भी पूजा-पद्धति और आचार-व्यवहारों में समय समय पर परिवर्तन होते रहते है।  उन परिवर्तनों का ही वर्णन पुराणों में है।  उसमें कोई नवीनता नहीं, युग-युग में इसी तरह की भगवान की लीलाएँ सदा से चलती रही हैं सदा चलती रहेगी।  श्री बद्रीनाथ के सम्बन्ध में प्रायः सभी पुराणों में विवरण मिलता हैं।  
पुराणों के अनुसार पहिले बद्री बन में भगवान की मूर्ति नहीं थी।  प्रत्यक्ष भगवान अपने स्वरूप से वहाँ रहकर तपस्या करते थे।  उन्हें तपस्या में निरत देखकर नारद जी ने उनसे पूछा, भगवान् आप तो त्रिलोकी के नाथ जगत्पति ईश्वर हैं, आप किसका ध्यान करते हैं।  भगवान् ने हँसकर कहा-’’नारद! इस जगत को उत्पन्न करने वाली प्रकृति के कारण भूत हम ही है, आत्मा ही पर तत्व है।  हम उस आत्मस्वरूप अपने आपका ही ध्यान करते हैं।  सब लोग भजन-भोजन में लगे रहें उनकी शिक्षा के लिये ही हम तप करते हैं यह सुनकर नारदजी प्रसन्न हुए और वही रहकर नारदजी भगवान् की पूजा अर्चना करने लगे।  इस क्षेत्र के प्रधान अर्चक-पुजारी श्रीनारदजी ही हैं।  इसलिये इस क्षेत्र का नाम नारदीय क्षेत्र भी है।  श्रीमदभगवत में जहाँ पञम स्कन्ध में सप्त-द्वाप और नव वर्षों का वर्णन है।  वहाँ प्रत्येक द्वीपों में भगवान की पृथक-पुथक उपास्य मूर्तियाँ बताई हैं और उन द्वीपों में पृथक पृथक प्रधान अर्चक पृथक मन्त्रों से अपने उपास्य देव की पूजा करते हैं।  जैसे हरिवर्ष में नृसिंह उपास्य हैं अ©र प्रहलादजी उस वर्ष के प्रधान अर्चक हैं।  रम्यकखण्ड में मत्स्य भगवान उपास्य हैं मनु उपासक हैं।  हिरण्मयखण्ड में कूर्म भगवान उपास्य है अर्यमा प्रधान उपासक हैं।  कि पुरूष खण्ड में श्री रामचन्द्र भगवान उपास्य हैं और हनुमानजी प्रधान अर्चक हैं।  इसी प्रकार इस भारतवर्ष में भगवान नर-नारायण उपास्य और नारदजी उनके प्रधान उपासक या अर्चक हैं।  वे भारतीय प्रजा के साथ नर नारायण रूप भगवान की पाञरात्र विधि से उपासना करते हैं।  पाञरात्र पूजा पद्धति नारद जी को कैसे प्राप्त हुई इसका विस्तार से वर्णन नारद पुराण, बराह पुराण, विष्णु धर्मोतर पुराण तथा अन्य पुराणों में हैं।
श्री भगवान् का वर्तमान विग्रह।

पुराकृतयुगस्यादौ सर्वभूत हिताय च।
मूर्तिमान्भगवांस्तत्रतपोयोग समाश्रिताः।।
त्रेतायुगेहिऋषिगणौ योगाभ्यासैक तत्परः।
द्वापरे समनुपाप्ते ज्ञान निष्ठोहि दुर्लभः।।
(स्कन्ध0 वै0 बदरी0 म0 अ0 3-4-5, श्लो0)

पहिले सत्ययुग में भगवान् मूर्तिमान् होकर तपस्या करते थे।  त्रेता से योगाभ्यासी ऋषियों दर्शन होते थे। द्वापर आने पर ज्ञाननिष्ठ मुनियों को भी भगवान् के दर्शन दुर्भभ हो गये अर्थात् उन्हें भी भगवान् दिखाई नहीं दिये। 

श्री भगवान् पहिले अपने साक्षात् रूप से बदरिकाश्रम में निवास करते थे।  जब भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन का अवतार ग्रहण करने जाने लगे तब ऋषियों ने कहा प्रभो! आप ही तो हमारे अवलम्ब हैं।  आप इस क्षेत्र को त्याग कर न जाँय।  एक रूप से आप यहाँ निवास करें और एक रूप से आप अवतार धारण करें।
भगवान् बोले- कलियुग मे मैं साक्षात् रूप से नहीं रह सकता!  नारद शिला के नीचे अलकनन्दा में मेरी एक दिव्य मूर्ति है उसे निकालकर तुम लोग स्थापित करो।  उसे जो कोई दर्शन करेगा उसे मेरे साक्षात् दर्शन का फल प्राप्त होगा।
ब्रह्मादि देवताओं ने नारदकुण्ड से वह मूर्ति निकाली।  मूर्ति शालिग्राम शिला में बनी हुई ध्यानमग्न चतुर्भुज बड़ी ही भव्य थी।  देवताओं ने विश्वकर्मा से मन्दिर बनवाया और नारद जी उसके प्रधान अर्चक नियुक्त हुए।

Pawan Mand Sugandh Sheetal Hem Mandir Shobhitam ,Neekat Ganga Bahut Nirmal ,Shri Badri Nath Vishwambharam ....