Badrinath Dham

 

बदरिकाश्रम

चारों धाम अनादि हैं, किन्तु युग-युग में इनके वाह्य रूपों का परिवर्तन डोता रहा है।  रामेश्वर में श्री शिवजी विराजमान हैं।  लंका के पूर्व श्री कौशिल्यानन्दन राम ने अपने इष्टदेव भगवान् भोलानाथ की आराधना की, इसीलिये ये राम के ईश्वर-रामेश्वर कहलाया।   इसीलिये वह त्रेता क्षेत्र है।  भगवान् के स्वधाम पधारने पर द्वारिकापुरी समुद्र में विलीन हो गई, किन्तु भगवान् के भवन को छोड़कर जहाँ कि भगवान् अब भी सदा सर्वदा वास करते हैं।  इसलिये यह धाम द्वापर प्रधान है।  श्री जगन्नाथजी ने काष्ठ का विग्रह क्यों धारण किया यह एक लम्बी कथा है।  इसका कारण भगवान् की इच्छा ही है, किन्तु भक्तों के अधीन होकर और भक्तों की श्रेष्ठता दिखाते हुए भगवान् ने प्रतिज्ञा की थी- ’’मैं चित्रस्थ गन्धर्व को न मार डालू तो मेरा कलियुग में काष्ठ का विग्रह हो। उस ऋषि के अपराध करने ,वाल गन्धर्व को अर्जुन और सुभद्रा ने अभयदान किया।  भगवान ने भक्तों के सामने हार मानी और वे श्री क्षेत्र जगन्नाथ में काष्ठ विग्रह से प्रतिष्ठित हुए।  और भी इस सम्बन्ध में कई कथायें हैं।  इसलिये यह क्षेत्र कलियुग क्षेत्र है।  भगवान् ने धर्म की पत्नी मूर्ति मे नर नारायण अवतार लेकर बदरिका आश्रम में तप करना आरम्भ किया।  इसीलिये यह सत्ययुग क्षेत्र है।  ये युग अनादि हैं।  सदा सर्वदा एक के बाद एक आते जाते रहते हैं।  कलियुग के बाद सत्ययुग यह परम्परा अनादि है इसीलिये ये क्षेत्र भी अनादि हैं।

पादौ हरेः क्षेत्र पदानु सर्पणो, शिरो हषीकेश पदाभिवन्दने।
कामं च दास्ये न तु काम काम्यया, यथोत्तश्लोक जनाश्रयारतिः ।।
(श्रीभाग 9)

पैरों की सार्थकता यही है कि वे भगवान् के पुण्य क्षेत्रों की यात्रा करते रहें।  सिर की सार्थकता भगवान् के प्रसादी चन्दन चढ़ी हुई माला को भोग इच्छा से नहीं किन्तु इस भावना से ग्रहण करें कि यह भगवान् का नैवे? है भगवान् की सेवा में लगा है, प्रसादी है, जिससे कि भगवत् आश्रितों को जो भगवत् प्रीति प्राप्ति होती है वह हमें भी हो।  

श्री बदरिकाश्रम भगवान विष्णु का सबसे प्रमुख अधिष्ठान है।  अनादिकाल से भगवान नारायण यहाँ नर के साथ तपस्यारत हैं।  यहाँ नारद, कुबेर, गरूड़ उद्धव एवं लक्ष्मी जी की मूर्तियाँ हैं।  जिनका नित्यप्रति अभिषेक व पूजन होता है।  शालिगराम शिला पर भगवान नारायण का विग्रह है।  यह दिव्य विग्रह अपनी आभा मात्र से भक्तों का तन-मन पुलकित कर देता है।

महाभारत में आया है कि वदर्याश्रम में देवगण निवास किया करते हैं, और वहां महर्षिगण के भी बहुत आश्रम विद्यमान हैं। शीतकाल में जब भगवान बदरीनारायण के कपाट छः मास के लिए बन्द हो जाते हैं, तब यह अवधारणा है कि देवर्षि नारद महर्षि नारायण की पूजा अर्चना किया करते हैं।  नारण की पच्चरात्र पूजा प्रसिद्ध है।  आज भी बदरीनाथ के कपाट बन्द होने के पांच दिन पूर्व से पंचरात्रि पूजा का विधान चला आ रहा है।

मार्कण्डये ऋषि की तपःस्थली और कर्मस्थली बदरिकाश्रम ही रही है।  जिस शिला पर ये बैठते थे उसे मार्कण्डये शिला के नाम से आज भी जाना जाता है।  इसके अलावा शायद ही हिन्दू धर्म में वर्णित कोई ऋषि-मुनि ऐसे रहे हों जो भगवान नारायण के दर्शन करने न गये हों और जिन्होंने उनसे प्ररेणा न ली हो।

कृष्ण यहां सायंगृह-मुनि के रूप में नारायणपुरी में तपस्या करने आये, वहीं श्रीराम भी भगवान नारायण के दर्शन के लिए बदरिकाश्रम पहुंचे। आनन्द रामायण में श्री राम के सपरिवार, बदरिकाश्रम की यात्रा करने का वर्णन मिलता है।

गत्वा देवप्रयागंचालकनन्दातटेन वै।
नर-नारायणौ गत्वा दर्शनान्मुुक्तिदौनृणाम्।।
बदरिकाश्रमे रामः केदारेशं विलोक्य सः।
महापथं ततो गत्वा ययौ तन्मानसं सरः।।
(आनन्द रामायण सर्ग- 9/4-6)

यही बात विष्णुपुराण में आयी है, जहां भगवान श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं कि-

गच्छ त्वं दिव्यया गत्या मत्प्रसादसमुत्थया।
यद्वदर्याश्रमं पुण्यं गन्धमादनपर्वते।।
नर-नारायणस्थाने तत्पवित्रं महीतले।
(विष्णुपुराण- 5/37/34)

अर्थात् हे उद्धव! अब तुम मेरी कृपा से प्राप्त हुई दिव्य गति से नर-नारायण के निवास स्थान गन्धमादन पर्वत पर, जो पवित्र बदरिकाश्रम क्षेत्र है वहाँ जाओ। पृथ्वीतल पर वही सबसे पावन स्थान है।  बदरिकाश्रम को सृष्टि के विभिन्न कालखण्डों में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया है यथा-

कृते मुक्ति प्रदा प्रोक्ता त्रेतायां योग सिद्धिदा।
विशाला द्वापरे प्रोक्ता कलौ बदरिकाश्रमः।।
(स्कन्दपुराण- 2/1/57)

Pawan Mand Sugandh Sheetal Hem Mandir Shobhitam ,Neekat Ganga Bahut Nirmal ,Shri Badri Nath Vishwambharam ....