Badrinath Dham

 

श्रीमद् भागवत (बदरिकाश्रम)

 

पादौ हरेः क्षेत्र पदानु सर्पणो, शिरो हषीकेश पदाभिवन्दने।
कामं च दास्ये न तु काम काम्यया, यथोत्तश्लोक जनाश्रयारतिः ।।
(श्रीभाग 9)

पैरों की सार्थकता यही है कि वे भगवान् के पुण्य क्षेत्रों की यात्रा करते रहें।  सिर की सार्थकता भगवान् के प्रसादी चन्दन चढ़ी हुई माला को भोग इच्छा से नहीं किन्तु इस भावना से ग्रहण करें कि यह भगवान् का नैवे? है भगवान् की सेवा में लगा है, प्रसादी है, जिससे कि भगवत् आश्रितों को जो भगवत् प्रीति प्राप्ति होती है वह हमें भी हो।  

एक भागवनं शास्त्रं मुज्दिदानेन गर्जनि
’’श्रीमद् भागवत ग्रन्थोडयं वुधानाम् सुलभः परत्र च विवुधानामपि दुर्लभ’’