Badrinath Dham

 

धर्मशिला नामक तीर्थ - मानसोदभेद तीर्थ - सम्याप्रास तीर्थ - कलाप ग्राम - मणिभद्रपुर


धर्मशिला नामक तीर्थ -

नाम्ना धर्मशिला तत्र स्नात्वाविश्य महामतिः।
वसुवर्णजपं कुर्याद्वसुलक्षं समाहितः।।
विष्णुसारूप्यतां याति सत्यमेव न संशयः।

वसुधारा के समीप धर्मशिला नामक तीर्थ है, इस पवित्र स्थान पर धर्मदेव ने तपस्या की थी। यहां स्नान करके प्रविष्ट होकर चित्त की एकाग्रतापूर्वक आठ लाख अष्टाक्षर मंत्र (ऊँ नमो नारायणाय) का जप करे। ऐसा करने से मनुष्य विष्णु के समान रूप वाला हो जाता है, यह सत्य ही है, इसमें सन्देह नहीं।

जपं तपों हरिःक्षेत्र पूजां स्तुत्यभिवन्दनम्।
महात्म्यं कुर्वतां वक्तुं ब्रह्माणाऽपि न शक्यते।।

धर्मशिला नामक तीर्थ

मानसोदभेद तीर्थ -

मानसं चिदचिद्ग्रन्थिमु्रदग्रन्थन्ति च सर्वतः।
मानसोदभेद इत्याख्या ऋषिभिः परिगीयते।।

(स्कन्द पुराणे)

यह तीर्थ मन की चिद् और अचित ग्रन्थियों को भेदन कर ढालता है।  इसलिये इस तीर्थ का नाम मानसोदभेद तीर्थ है। भगवती सरस्वती गंगा, बड़ी अगाध और तीक्षण नदी हैं, पत्थरों को तोडती फोड़ती तिब्बत की ओर से आती है  और माणा के पास अलकनन्दा जी में आकर गिरती है।  इन दोनों के संगम को ’’केशव प्रयाग’’ कहते हैं। भीम-शिला के सामने से बाईं ओर पत्थर को फोड़ कर जल की दो बड़ी मोटी मोटी धारायें गिरती हैं।  लोगों का कथन है कि इतना सुन्दर स्वच्छ और स्वास्थ्यप्रद जल गढ़वाल भर में कहीं नहीं हैं  इसी तीर्थ का नाम मानसोदभेद तीर्थ है।  पुराणों में इसका बड़ा भारी माहात्म्य बताया है।  इसकी प्रशंसा करते करते यहाँ तक कह दिया है-

साधनानि बहुन्येव कायक्लेशकरण्यहो।
सुलभं साधनं लोके मानसोदभेददर्शनम्।।

संसार में बहुत से शरीर को क्लेश देने वाले साधन हैं किन्तु सबसे सुलभ पापों के नाश करने का साधन यहीं हैं कि वह जाकर मानसोदभेद तीर्थ का दर्शन कर ले।

सम्याप्रास तीर्थ -

ब्रह्मानद्यां सरस्वत्यामाश्रयः पश्चिमे तटे।
सम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सत्रवर्धनः।।

(भाग0 1 स्क0 7 अ0 1 श्लो0)

जिधर संगम है अर्थात सरस्वती के पश्चिम तट पर वसुधारा की ओर से ही सम्याप्रासतीर्थ है, जहाँ भगवान व्यास जी रहते थे।  उस भूमि का ही नाम सम्याप्रास हैं।  बड़ी पवित्र और सुन्दर भूमि है।  भगवान वेदव्यास के आश्रम के सम्बन्ध में कहा है -

’’तस्मिन स्व आश्रमे व्यासो बदरीखंडमंडिते’’। 

यहाँ पहाड़ी बदरी के वृक्ष बहुत हैं। भगवान वेदव्यास जी ने पुराणों और वेदों का व्यास नर नारायण पर्वत के बीच में देवी माता मूर्ति के सामने सरस्वती के तट पर, यहीं किया हैं  इसीलिये वे प्रत्येक पुराण तथा महाभारत के अन्त में नर नारायण नरोत्तम, देवी (माता मूर्ति) और सरस्वती की बंदना करते हैं।  इसीलिये वे कहते हैं-

नारायणां नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्।।

कलाप ग्राम -

देवापिः शन्तनोर्भ्राता मरूश्चेक्ष्वाकुवंशजः।
कलापग्राम आसाने महायोगबलान्वितौ।।
ताविहैत्य कलेरन्ते वासुदेवानुशिक्षितौ।
वर्णाश्रमयुतं धर्म पूर्ववत् प्रथयिष्यतः।।
(श्रीमा0 12 स्क0 2 अ0 36, 38 श्लो0)

मुचुकुन्द गुफा के पीछे बड़ा भारी मैदान है।  नीचे भगवती सरस्वती की निर्मल धारा बह रही हैं  बड़ा ही सुन्दर दृश्य है।  उस पार भी मैदान है।  उसी पार से सरस्वती के किनारे किनारे से तिब्बत का रास्ता है।  उसी रास्ते से थोलिगंमठ होते हुए मानसरोवर कैलाश के लिये जाते हैं।

सुनते हैं कलाप ग्राम में गुप्त रूप से बहुत से ऋषि मुनि ओर राजर्षि रहकर तपस्या करते हैं।  किसी भाग्यशाली को उनके दर्शन भी हो जाते हैं।   स्थान बड़ा रमणीक है।  पहाड़ की चोटी पर ऐसा मैदान कम देखने में आता है।

श्रीमदभागवत में लिखा है कि भीष्मपितामह के चाचा शन्तनु के भाई देवापि चन्द्रवंश के और इक्ष्वाकु के वंशज महाराज मरू ये दोनों योगबल से कलाप ग्राम में रहकर तपस्या कर रहे हैं।  जब कलियुग का अन्त होकर सत्ययुग लगेगा तो वे तपस्या छोड़कर फिर से सूर्यवंश और चन्द्रवंश की स्थापना करेंगे।

मणिभद्रपुर -

मणिभद्राश्रमस्तत्र महाविष्णुश्च तत्र वै।
पुरा यत्र वरारोहे भीमसेनोजयद्रिपून्।।
गन्धर्वाख्यान्महाभागे भद्रे भद्रपुरः सरान्।
तत्र पाण्डवतीर्थं हि पाण्डवा यत्र संस्थिताः।।

माणा ग्राम, यह भारतवर्ष का सबसे अन्तिम ग्राम है, इससे आगे कोई ग्राम नहीं।  इसका प्राचीन नाम मणिभद्रपुर है। यहाँ मणिभद्राश्रम है तथा महाविष्णु भी है, यहाँ पूर्वकाल में भीमसेन ने भद्रपुर सर गन्धर्व नामक शत्रुओं को जीता था।  यहाँ पाण्डवतीर्थ है, जहाँ पाण्डव रहे थे। धौम्य और लोमश के साथ महात्मा पाण्डवों ने (मणिभद्रपुर) तपस्या की थी।

Pawan Mand Sugandh Sheetal Hem Mandir Shobhitam ,Neekat Ganga Bahut Nirmal ,Shri Badri Nath Vishwambharam ....