Badrinath Dham

 

घंटा कर्ण - (क्षेत्रपाल)

यत्र विष्णुर्जगन्नाथस्तपस्तप्त्वा सुदारूणम्।
द्धिधाकरोत् स्यमात्मानं नर नारायणाख्यया।।
सिद्ध क्षेत्रमिदं प्राहुऋषयों वीत मत्सराः।
विशालां वदरी विष्णुस्तां द्रष्टुँ सकलेश्वरः।।

(श्री हरिवंश-5 स्क0 21/29 श्लो0)

भगवान बदरी विशाल के मन्दिर में दाई ओर परिक्रमा में कथा मंडप के समीप घंटाकर्ण की बिना धड़ की एक मूर्ति है।  उन्हें भगवान का द्वारपाल या कोतवाल कहते हैं।  घंटाकर्ण कौन थे और यहाँ आकर कोतवाल क्यों हुए इनकी हरिवंश पुराण में बड़ी ही सुन्दर कथा है।

घंटाकर्ण की कथा से पता चलता है कि भगवान नर नारायण भावग्राही हैं।  संसार में भावना ही प्रधान है। यह संसार भावनामय है।  हमारी भावना ही फलवती हुआ करती हैं,  भावहीन कर्म निष्फल हैं घण्टाकर्ण रूधिर मांस खाने वाला पिशाच था, क्रूरकर्मा और हिंसक था।  अपने शुद्ध भाव से ही वह मुक्ति का अधिकारी हुआ और साक्षात नारायण ने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसके मनोरथ को पूर्ण किया।

घंटाकर्ण पिशाच था।  शिवजी का अनुचर और अनन्य शिव भक्त था।  शिवजी में ही एकमात्र उसकी भक्ति थी।  वह अपने दोनों कानों में बड़े-बड़े घंटा बाँधे रहता था कि कहीं मेरे कानों में विष्णु का नाम सुनाई न दे।  हजारों वर्ष उसने अन्नय भाव से भूतपति भवानीनाथ शंकर की आराधना की।  उसकी आराधना से प्रसन्न होकर शिव ने उससे कहा-’’वत्स! मैं तुम्हारी भक्ति से सन्तुष्ट हूँ, तुम जो मुझसे चाहो वर माँगो।’’ घंटाकर्ण ने कहा-’’हे प्रभो! देवाधिदेव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे मुक्ति प्रदान कीजिये।’’

भोलेनाथ बाले-’’वत्स! तुम धन ऐश्वर्य और जो चाहो सो माँग लो मुक्ति के एक मात्र दाता तो श्रीहरि ही हैं।  मैं मुक्ति नहीं दे सकता।  यदि तुम्हें मुक्ति की इच्छा है, तो श्रीमन्नारायण की शरण जाओ उनकी आराधना से ही प्राप्त हो सकती है।’’

यह सुनकर घंटाकर्ण चैंक पड़ा।  बोला मैं तो एक मात्र मुक्ति का ही इच्छुक हूँ।  जिन वैकुण्ठनाथ श्रीमन्नारायण को आप मुक्ति का स्वामी बताते हैं, उनका तो मैं सदा विरोधी रहा हूँ।  मैं तो उनका नाम भी कभी नहीं सुनता था इसीलिये अपने कानों में घंटा बाँधे रहता था ,यह कह कर वह फूट 2 कर रोने लगा।
शिवजी ने कहा-’’वत्स! घबडा़ओं मत।  श्रीहरि करूणा-सागर हैं भक्तवत्सल है! वे एक बार सच्चे हृदय से शरण जाने वालों के सब अपराधों को क्षमा कर देते हैं।  तुम इन्ही की शरण जाओ।’’

शिवजी ने कहा-’’आजकल वे द्वारिका में अबतीर्ण हुए हैं, तुम उन द्वरिकाधीश श्रीकृष्ण की ही शरण में जाओ!’’

द्वारिकापुरी में पहुँचकर उसे पता चला कि भगवान वासुदेव तो पुत्र की इच्छा से शिवजी की आराधना करने उन्हंे प्रसन्न करने कैलाश पर्वत पर गये हैं।  तब तो उसकी उत्कंठा और भी बढ़ी।  वह वहाँ से रोता रोता कैलाश की ओर चला।  चलते चलते वह रास्ते में बदरिकाश्रम में पहुँचा। द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण ऋषि मुनियों द्वारा सेवित उस बदरिकाश्रम में ठहर कर समाधि में लीन थे। उन्होंने समाधि में से अपने नेत्र खोले।  सामने घंटाकर्ण और भूत पिशाचों को देखा।

भगवान ने उसके पास जाकर पूछा, तुम अपने आने का कारण बताओं।

यह सुनकर घंटा कर्ण ने कहा-’’तुम कौन हो ?’’

भगवान ने कहा-’’मैं यहाँ का रक्षक हूँ यहाँ के लोगों की दुःख से रक्षा करता हूँ, जो लोग पापी हैं दूसरे को दुख देते हैं उन्हें दण्ड भी देता हूँ।’’

यह सुनकर घंटा कर्ण ने सब वृत्तान्त सुनाया।

वह बोला-’’मेरा नाम घण्टाकर्ण हैं, शिवजी की आज्ञा से मुक्तिदाता श्रीहरि की शरण आया हूँ।  वे कृपा के सागर, भक्तवत्सल, जनार्दन मुझे कब मिलेंगे? कब मुझ पापकर्मा पिशाच को अपने दर्शन देंगे?  हे मनुष्य तुम सुख पूर्वक अपने काम में लगो मैं उन अचिन्त्य परमात्मा श्रीमन्नारायण के ध्यान में मग्न होता हूँ।’’ यह कहकर उसने रक्त और मांस को अलग रखा। और वह गंगाजी के किनारे ध्यान में मग्न हो गया।  भगवान के ध्यान में वह ऐसा लीन हुआ कि उसे शरीर की सुध तक नहीं वह एक दम समाधि मग्न हो गया।  उसके ऐसे भाव को देखकर भक्तवत्सल श्रीहरि बड़े प्रसन्न हुए, उन्होंने सोचा-’’इस मांसाहारी पिशाच की कैसी आश्चर्यजनक भक्ति है।  इसका कैसा शुद्ध भाव हैं, कैसी उत्कृष्ट प्रीति हैं  ऐसी समाधि तो बड़े बडे योगियों की भी नहीं लगती।  यह सोचकर भगवान उसके हृदय में चतुर्भुज रूप से प्रकट हुए।  हृदय में भगवान के दर्शन पाकर वह पिशाच प्रेम में गद-गद हो गया।  शंक चक्रधारी, के अदभुत दर्शन पाकर वह रोने लगा।  आँसुओं से उसके वस्त्र भीग गये।  रूद्ध कंठ से भगवान की मन ही मन स्तुति करने लगा।

संसार को वह एक दम भूल गया और भगवान के देव दुर्लभ सौंदर्य माधुर्य का भक्ति के साथ पान करने लगा। भगवान के रूप माधुर्य में वह इतना मग्न हुआ कि उसकी समाधि खुली ही नही, ंतब भगवान ने अपना रूप खींच लिया।  जब उसने आँखें खोलकर बाहर देखा तो वही मूर्ति उसके सामने प्रत्यक्ष खड़ी मिली। तब से घंटाकर्ण क्षेत्रपाल होकर बदरीवन में ही वास करने लगा।