Badrinath Dham

 

केशव-प्रयाग - मातामूर्ति मन्दिर - भीमपुल - वसुधारा तीर्थ


केशव-प्रयाग

यहाँ आपको भगवती अलकनन्दा और सरस्वती का सुन्दर सुहावना संगम दिखाई देगा।  केदार खण्ड में इनको ’’केशव-प्रयाग’’ लिखा है।  स्कन्द पुराण में सरस्वती की बडी महिमा बताई गई है।  वहाँ लिखा है यह द्रव रूपा साक्षात वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती है।  इसके जल में मंत्र, जप और अनुष्ठान का बड़ा फल है।  भगवान वेद व्यास जी इसी का जल पीने से तथा इसी सरस्वती की कृपा से पुराणों के मर्मज्ञ हो गये।  इसीलिए इसके जल की बड़ी महिमा गाई हैं। लिखा है-

दर्शन-स्पर्श-स्नानपूजा-स्तुत्यभिवन्दनैः।
सरस्वत्या न विच्छेदः कुले तस्य कदाचनः।।

जो सरस्वती का दर्शन, स्पर्शन, स्नान, पूजा स्तुति अथवा वन्दना करते हैं।  उनके कुल में कभी सरस्वती का विच्छेद नहीं होता है।  उसके वंश के लोग सब बुद्धिमान होते है।

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केशव-प्रयाग

मातामूर्ति मन्दिर

श्री बदरीनाथ से तीन किमी0 दूरी पर नारायण पर्वत की सुरम्य तलहटी पर अलकनन्दा के दाहिने पार्श्व भाग में मातामूर्ति का पवित्र मन्दिर है।  मन्दिर में पत्थर की माता जी की मूर्ति रखी गई है।  भगवान नारायण के तपस्या भाव को देखकर माता ने भी इस स्थान पर तपस्या की।  भगवान नारायण ने मां की भावना को देखकर, मां को आश्वासन दिया कि भाद्रपद की बामन द्वादशी को मैं सम्पूर्ण परिजनों सहित आपके दर्शन को प्रति वर्ष आऊंगा व इसी स्थान पर मेरी दैनिक पूजा भी माता के सानिध्य में होगी।

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मातामूर्ति मन्दिर

संगमात् दक्षिणीभागे धर्मक्षेत्र प्रकीर्तितम्।
यत्रमूर्त्या श्रुतौजातौ नरनारायणावृषी।।

तब से आज तक प्रति वर्ष भाद्रपद के महिने की बावन द्वादशी तिथि को भगवान श्री बदरीनाथ की उत्सव मूर्ति पालकी में पुजारियों द्वारा उत्साह से गाजे-बाजे के साथ माता-मूर्ति  जाती है।  प्रधान पुजारी रावल जी केशवप्रयाग में स्नान कर इसी स्थान पर भोग-प्रसाद बनाते व पूजा करते हैं।  मन्दिर के वेदपाठी, कर्मचारी व श्रद्धालु यात्री बदरीनाथ से माणा जाकर इस पूजा में भोग-प्रसाद को प्राप्त करते हैं।  इस पवित्र तीर्थ में देवी की उपासना की जाती है।  देवी उपासना का यह पवित्र स्थान भगवान नारायण की माता की तपःस्थली होने के कारण माता-मूर्ति के नाम से विख्यात है।

भीमपुल

भीमपुल। कहते हैं पांडव इसी मार्ग से होते हुए अलकापुरी गए थे। प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ-साथ भीम पुल से एक लोक मान्यता भी जुड़ी हुई है। जब पांडव इस मार्ग से गुजरे थे। तब वहाँ दो पहाड़ियों के बीच गहरी खाई थी, जिसे पार करना आसान नहीं था। भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है।

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भीमपुल

वसुधारा तीर्थ

मनसोदभेदनात प्रयग् दिशि सर्वमनोहरम्।
वसुधारेति विख्यातं तीर्थ त्रैलोक्यदुर्लभम्।।
(स्कन्द पुराण)

मानसोदभेद तीर्थ से पश्चिम दिशा में परम मनोहर त्रैलोक्यदुर्लभ वसुधारा नाम का तीर्थ हैं। ऊपर पहाड़ से मोतियों को बरसाती हुई, वायु में झोके खाती हुई, हर हर शब्द करती हुई वसुधारा की परम पावन धारा दिखाई देती है। इतना सुन्दर मनोहर झरना और कोई भी देखने में नहीं आता।  वसुधारा के दर्शनों को बहुत से यात्री आते हैं।  बद्रीनाथ की यात्रा में आने वाले यात्रियों का प्रायः आठवाँ भाग यहाँ आता है।  बदरीपुरी से यह स्थान पाँच मील है।  बडा़ ही सुन्दर और मनमोहक दृष्य है।  बहुत ऊँचे से जल की धारा गिरती है और बीच में ही हवा के झोकों से बिखर कर खील हो जाती है।  वे कण पृथक पृथक गिरते हुए ऐसा मालूम पड़ते हैं मानों मोती झर रहे हों।  स्कन्द पुराण में ऐसा लिखा है कि जो अवैध माता-पिता से उत्पन्न हुए हैं, अथवा पाखण्डी या पापी हैं, उनके शरीर पर यह जल नहीं गिरता।

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वसुधारा तीर्थ

येऽशुद्धपितृजाः पापाः पाखण्डमवित्तयः।
न तेषां शिरसि प्रायः पतन्यापा कदाचन।।
(स्कन्द पुराण)

वसुधारा का माहात्म्य:-

अत्र स्नात्वा जलं पीत्वा पूजयित्वा जनार्दनम्।
इहलोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते परमं पदम्।।

जो लोग यहाँ स्नान करके जल पीकर जनार्दन भगवान का पूजन करते हैं, वे इस लोक में सुख भोग कर अन्त में परम पद को प्राप्त होते है।

Pawan Mand Sugandh Sheetal Hem Mandir Shobhitam ,Neekat Ganga Bahut Nirmal ,Shri Badri Nath Vishwambharam ....