Badrinath Dham

 

लक्ष्मी वन - सहस्त्रधारा - पंच धारा तीर्थ - द्वादशादित्य तीर्थ


लक्ष्मी वन

लक्ष्मी वन में लक्ष्मी जी प्रकृति का ही रूप बनाकर वास करती हैं वहाँ उनकी कोई मूर्ति नहीं हैं।  बड़े बडे भोजपत्र के वृक्ष लक्ष्मी जी की शोभा की याद दिलाते है।  सतपथ के यात्री एक दिन यहीं निवास करते हैं।  इससे सुन्दर जगह कोई नहीं।  अलकनन्दा यहाँ शान्त सी दीखती है।  एक छोटा झरना भी हैं  जिसे लक्ष्मी-धारा कहते है।

लक्ष्मी वन

सहस्त्रधारा

लक्ष्मी-धारा से आगे धीरे धीरे चढ़ाई चढ़ते चढ़ते पहाड़ के बीच में पतली धारा सी मिलती है।  उसी पर सावधानी से चलना पड़ता है। प्रकृति का ऐसा निर्मल सौन्दर्य! ऐसा संसार में शायद ही कहीं हो। यहाँ से नारायण पर्वत पत्थर की एक दीवार की तरह बन गया है।  उस पर से निर्मल स्वच्छ सैकड़ों हजारों धारा बह रही है। उसका नाम सहस्त्रधारा है । नेत्रों का साफल्य यहीं प्रतीत होता है।  धारायें जाड़ों में जम जाती हैं।  वैशाख ज्येष्ठ में ज्यों ज्यों बर्फ गलती जाती है, ये फिर द्रव होकर बहने लगती हैं।  

सहस्त्रधारा

पंच धारा तीर्थ

ततो नैऋत्यदिग्भागे पंचधाराः पतन्त्यधः।
प्रभासं पुष्करं चैव गयां नैमिषमेव च।।
कुरूक्षेत्रं विजानीहि द्रवरूपं पडानन।

अर्थात वसुधारा से नैऋर्त्य भाग में पांचधारायें गिरती हैं, उनके नाम प्रभास, पुष्कर, गया, नैमिष और कुरूक्षेत्र धारा है।  इस हिमाच्छादित घोर एकान्त पर्वतीय प्रदेष में ये पाँचों प्रसिद्ध पुष्प पवित्र तीर्थ आकर बस गये इस सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा हैं

ये पाँच बड़े पावन तीर्थ हैं।  इनमें स्नान करते ही पाप कट जाते हैं। कितना भी पुण्यात्म पुरूष क्यों न हो, दान लेते लेते उसका पुण्य नष्ट हो जाता है।

ब्रह्माजी की आज्ञा शिरोधाय्र करके ये पाँचों मूर्तिमान देव रूपी तीर्थ यहाँ बदरिकाश्रम में आये।  आते ही इन सबके पाप तो धुल गये।  तपस्या करने से फिर वैसे ही तेजस्वी हो गये।  ऐसा पवित्र तीर्थ समझ कर और इस क्षेत्र की इतनी भारी महिमा जान कर इन लोगों में अपने दो रूप बनाए।  एक रूप से तो ये लोग यहीं रहते हैं और एक रूप से अपने अपने क्षेत्र में रहते हैं।

पुराणों में इन धाराओं में स्नान का और दान का निवास करके उपवास करने का बढ़ा पुण्य लिखा है।

द्वादशादित्य तीर्थ -

द्वादषादित्यतीर्थं वै सर्वपापप्रणाशनम्।
गायते यो बृहत्साम्ना श्रीविष्णुं रविवासरे।।

द्वादशादित्य तीर्थ समस्त पापों का नाशक है।  वहाँ जो रविवार को बृहत्साम मंत्र से श्रीविष्णु की स्तुति करता है, वह नीरोग, सर्वभोगस्म्पन्न और लोकप्रिय होता है।

यत्र तप्त्वा पुनः कृच्छं कश्पपः सूर्यता ययौ।

यहाँ कश्यप के पुत्रों ने सूर्य पदवी को फिर से प्राप्त किया।

Pawan Mand Sugandh Sheetal Hem Mandir Shobhitam ,Neekat Ganga Bahut Nirmal ,Shri Badri Nath Vishwambharam ....