Badrinath Dham

 

बदरिकाश्रम माहात्म्यं

बदरीवनमाहात्म्यं कथयामास पार्वतीम्। तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पुण्यं पापविनाशनम्।।
कण्वाश्रमं समारभ्य यावन्नन्दगिरिर्भवेत्। तावत्क्षेत्रं परं पुण्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्।।
किं किं न जायते तस्य मुक्तिस्तस्य करे स्थिता। धन्याः कलियुगे धोरे ये नरा बदरीं गताः।।

(स्कन्ध0 बदरी0 म0 अ0 57)

कण्वाश्रम से लेकर नन्दगिरि तक जितना क्षेत्र है, वह परम पवित्र और भुक्तिमुक्तिदायक है। भयंकर कलियुग में वे मनुष्य धन्य हैं जो बदरिकाश्रम में पहुँच जाते हैं।

यहाँ नदियों में श्रेष्ठ तथा पापसमूह का नाश करनेवाली साक्षात् गंगा विराजमान हैं।  यहाँ विष्णु का सान्निध्य भी समस्त पापों का नाशक है। यहाँ ब्रह्मा, रूद्र, विष्णु, देवता, गन्धर्व, अप्सरा, किन्नर, प्रमथगण, यक्ष, राक्षस ये सब विष्णु में चित्त लगाकर वास करते हैं।  मुक्ति चाहनेवाले व्यक्ति इस श्रेष्ठ क्षेत्र का कभी त्याग न करें। जब तक अंग शिथिलता को प्राप्त नहीं करते हैं तब तक बदरी की यात्रा करने में विलम्ब नहीं लगाना चाहिए।

बदरिकाश्रम में जाने से चरणों को सफल करे और विष्णु के दर्शन से नेत्रों को सफल करे। उसका जन्म सफल है और उसी का तप भी सफल है। जो व्यक्ति उसको भक्ति से नमस्कार करता है, उसके पापों का क्षय हो जाता है।

प्रायः कलौ मनुष्याणामगम्या बदरी भवेत्। यावद्विष्णुर्महीपृष्ठे यावदगगां महेश्वरि।।
तावद्वै बदरी गम्या दुर्गम्या  ततः परम्। बदरीनाथयात्रां वै करिष्यति बहिः स्थलात्।।

(स्कन्ध0 बदरी0 म0 अ0 58- 68 69)

प्रायः कलियुग में मनुष्यों के लिए बदरिकाश्रम अगम्य (पहुँच से बाहर) होगा।  महेश्वरि! जब तक भूतल पर विष्णु रहेंगे और जब तक गंगा रहेंगी तब तक बदरिकाश्रम गम्य रहेगा और उसके बाद अगम्य हो जायेगा।  तब बाहर की भूमि से लोग बदरीनाथ की यात्रा करेंगे। नर-नारायण के आश्रम में जो शरीरत्याग करते हैं, वे इस भयावह संसार में पुनः उत्पन्न नहीं होते हैं।  ऋषियों की गंगा नदी में जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर स्नान करके जल पीते हैं, वह परबह्म को प्राप्त करते हैं।

यदीच्छेत्सुतरां शुद्धिं दर्शनेन परात्मनः। तथा पञचशिलां नत्वा परिक्रम्यार्चयेत्सुधीः।।
धन्यः स एव लोकेषु बदरीशे तथा प्रिये। त्रुटिमात्रं किल स्वर्णं दद्याद्यो ब्राह्मणाय वै।।
तस्या पुण्यफलं को वै वक्तुं शक्तः कथं भवेत्। सम्पूज्य तत्र केदारं शिवलोके महीयते।।
परिक्रमेत्तु यो देवं बदरीनायकं परम्। ससमुद्रवनद्वीपा दत्ता भूमिर्महात्मना।।

(स्कन्ध0 बदरी0 म0 अ0 58। 108- 111)

यदि परमात्मा के दर्शन अत्यन्त शुद्धि से चाहे तो विद्वान् व्यक्ति पंचशिला को नमस्कार तथा परिक्रमा करके अर्चन करे। बदरिकाश्रम में जो त्रुटि मात्र सोना ब्राह्मण को देता है, उसके पुण्यफल को बताने में कौन समर्थ हो सकता है।  वहाँ केदार का सम्यक् पूजन करके मनुष्य शिवलोक में पूजित होता है।
जो व्यक्ति बदरीनायक श्रेष्ठदेव की परिक्रमा कर लेता है।  वह महात्मा, समुद्र, वन तथा द्वीप समेत पृथ्वी दान का फल पा जाता है। और उसके पितर विष्णु के परम पद को चले जाते हैं।  वे ही लोग धन्य हैं, जिन्होंने बदरीवृक्ष को देखा है। अथवा जो बदरिकाश्रम में विष्णुपरायण होकर रहे हैं।  जहाँ विष्णुलोक देनेवाली नारदीय शिला है और जहाँ उत्तम मुनियों द्वारा की गयी वेदध्वनियाँ सुनायी पडती हैं।  वहाँ जो कर्म किया जाता है वह करोड़ गुना अधिक फल देनेवाला होता है। वहाँ नारदीय कुण्ड में स्नान करने से पुनः माता का दूध नहीं पीना पड़ता है।  वहाँ की मिट्टी कुंकुम के वर्ण की आभावाली बहुत सुन्दर दिखाई पड़ती है।  वहाँ लक्ष्मी तथा विभु लक्ष्मीपति की बहुत-सी मूर्तियाँ विद्यमान हैं। युग-युग में विष्णु के अंशभूत बदरीनाथ नामक देवेश्वर की स्थापना करते रहेंगे। वहाँ वाराही शिला पापनाशिनी एवं सकल कामनादायिनी है। विष्णुपदी में वाराह कुण्ड प्रसिद्ध है। उसमें स्नान तथा जप करके मनुष्य अनन्त फल प्राप्त करता है।  वहाँ नारसिंही शिला समस्त पापों का नाश करनेवाली है। वहाँ भोगमोक्षदायक कुण्ड भी प्रसिद्ध है।  वहाँ मार्कण्डेयशिला सभी लोकों में दुर्लभ है। जिसके छूने से भी मनुष्य सभी पापों से छूट जाता है।  गारूड़ी शिला भी कही गयी है, जहाँ महात्मा गरूड़ ने विष्णु का वाहनत्व एवं उनकी परम मित्रता प्राप्त की। उस (शिला) का दर्शन, स्पर्श तथा अर्चना करने से नर नारायण हो जाता है। इन पाँच शिलाओं के बीच बदरीनाथ का आसन है। इससे बढ़कर तीनों लोक में दुर्लभ कोई तीर्थ नहीं है।

बदरी सदृशं तीर्थ न भूतं न भविष्यति।।