Badrinath Dham

 

विशाला बदरी

नर और नारायण पर्वतों की गोद में और नीलकंठ पर्वत  श्रृंखलाओं के सामने समुद्र तल से लगभग 3133 मीटर की ऊंचाई पर बसा मुक्तिप्रद परम महापावन तीर्थ श्री बद्रीनाथ धाम विद्यमान है ।

भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा चारों धाम में से एक के रूप में स्थापित किया गया था। 

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विशाला बदरी

योगध्यान बदरी

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योगध्यान बदरी

पांडुकेश्वर नामक स्थान पर भगवान नारायण का ध्यानावस्थित तपस्वी स्वरूप का विग्रह विद्यमान है, अष्टधातु की यह मूर्ति बड़ी चित्ताकर्षक और मनोहर है।  जनश्रुति है कि भगवान योगध्यान बदरी की मूर्ति इन्द्रलोक से उस समय लायी गयी थी, जब अर्जुन इन्द्रलोक से गन्धर्व विद्या प्राप्त कर लौटे थे।  शीतकाल में जब नर-नारायण आश्रम में भगवान नारायण मन्दिर के पट बन्द हो जाते हैं तब भगवान के उत्सव विग्रह का पूजन इसी स्थान पर होता है।  प्राचीन काल में रावल भी शीतकाल में इसी स्थान पर रहने लगे, उनके द्वारा इस स्थान पर भगवान बदरीनारायण की पूजा करने से यहां पर स्थापित नारायण का नाम योगध्यानबदरी हो गया।

वृद्ध बदरी

यहां पर भगवान विष्णु का अत्यन्त सुन्दर विग्रह है।  यहां पर भगवान नारायण की नित्य-प्रति पूजा व अभिषेक होता है।  यह स्थान हेलंग से आगे जोशीमठ मार्ग पर पड़ता है।  पंचबदरी में हेलंग व जोशीमठ के रास्ते में अणिमठ नामक स्थान पर जो श्री बदरीनारायण का प्राचीन मन्दिर है, वह ही ’वृद्ध बदरी’ है।  वृद्ध बदरी नाम पड़ने के पीछे यह श्रुति है कि- एक बार देवर्षिक नादर मृत्युलोक में भ्रमण कर रहे थे, भ्रमण करते हुए वे बदरीधाम की ओर जाने लगे, मार्ग को विकटता देखकर थाकान मिटाने के लिए वे आणिमठ (अरण्यमठ) नामक स्थान पर विश्राम करने लगे, उन्होंने इस स्थान पर कुछ समय बैठकर भगवान विष्णु  की अराधना व ध्यान किया तथा विष्णु से प्रार्थना की कि मुझे आप दर्शन दें, तब भगवान बदरीनारायण ने एक वृद्ध के रूप में नारद जी को दर्शन दिये, तब से इस स्थान में बदरी-नारायण की मूर्ति स्थापना हुई, तब ही से इसका नाम ’वृद्धबदरी’ पडा।

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वृद्ध बदरी

भविष्य बदरी

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भविष्य बदरी

मान्यता है कि कलियुग के गहराने पर जोशीमठ के समीप जय-विजय नाम के दोनों पहाड़ आपस में मिल जाएंगे, जिससे विशालापुरी दर्शन असम्भव हो जायेंगे।  तब भक्तगण भविष्यबदरी में भगवान के विग्रह का दर्शन पूजन कर सकेंगे।

भविष्य बदरी नीति रोड पर तपोवन से आगे सुभांई गाँव के पास स्थित है।

यह स्थान तपोवन से आगे 4 किलोमीटर चढ कर देवदार के घने जंगल में प्राप्त होता है।  यहां पर पत्थर में अपने आप भगवान का विग्रह प्रकट हो रहा है।

ध्यान बदरी

इस स्थान पर कल्प वाप को शुरूआत इन्द्र द्वारा की गयी थी, पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब देवराज इन्द्र दुर्वासा के शाप से श्रीहीन हो गये तब इन्द्र ने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इस स्थान पर कल्पवास किया था।  तब से इस स्थान पर कल्पवास की परम्परा चल निकली कल्पवास में चूंकि साधक भगवान के ध्यान में लीन रहता है, इसलिए यहां पर भगवान का विग्रह भी आत्मलीन अवस्था में अधिष्ठान किया गया होगा, जिस कारण नारयण के इस विग्रह को ध्यानबदरी नाम से सम्बोधित किया गया होगा, जिस कारण नारायण के इस विग्रह को ध्यानबदरी नाम से सम्बोधित किया जाने लगा।  नारायण भक्तों के लम्बे प्रवास ने यहां पर विष्णु मन्दिर को जन्म दिया तथा इस मन्दिर को पंचबदरी के अंग के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।  प्राचीन काल में इस स्थान पर देवताओं ने भगवान की तपस्या की जिस पर प्रसन्न होकर भगवान ने देवताओं को कल्प वृक्ष प्रदान किया।  यह स्थान उर्गम गांव के बीच में स्थित है।

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ध्यान बदरी