Badrinath Dham

 

पंच शिला

गरूड़ शिला

गरूड भगवान विष्णु के वाहन हैं, जिस प्रकार शिवालय में बिना नन्दी और गणेश को नमन् किये प्रवेश करने पर-पूजा आराधना भगवान शंकर स्वीकार नहीं करते, ठीक उसी प्रकार श्रीबदरिकाश्रम में गरूड भगवान के दर्शन और आराधना के बिना श्री बदरीनारायण के दर्शन पूर्ण नहीं होते।  केदारखण्ड पुराण में आया है कि-

गरूड़ी च तथा प्रोक्ता गरूड़ेन महात्माना।।
प्राप्तं हरेर्वाहनत्वं सख्यं च परमं हरेः।
द्दष्ट्वा स्पृष्ट्वा तथाभ्यच्र्य नरो नारायणों भवेत्।।

(केदारखण्ड- 58/121-22)


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गरूड ने इस शिला का कीर्तन किया था, अतः उसे गरूड शिला भी कहते हैं।  गरूड को इसी से हरि वाहनत्व एवं भगवान की मित्रता का लाभ मिला था।  इस शिला के दर्शन-पूजन और स्पर्श करने नर ’नारायणमय’ हो जाता है।  गारूडी शिला में इस स्तुति से भगवान नारायण शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं तथा भक्तों के त्रिविधतापों और समस्त अरिष्टों को गरूड़ भगवान तत्काल दूर कर देते हैं।  श्रीबदरिकाश्रम में माहात्मा गरूड ने भगवान नारायण की स्तुति कर जगत को पवित्र करने वाली तथा तीन लोकों में गमन करनेवाली गंगा माता का जल लाकर प्रभु का पूजन किया।
उसी के जल से महात्मा गरूड ने प्रभुचरणों में अध्र्यदान किया, जिससे प्रसन्न भगवान ने इस शिला का नाम गारूडीशिला होने का वरदान दिया तथा गरूड ने वरदान मांगा कि- 

इयं मन्नमविख्यातासर्वपापहराशिला।
एतस्याः स्मरणात्पुंसाविषव्याधिर्नजायताम्।।

(वैष्णवखण्ड, बदरी मा0- 4/22)

यह मेरे नाम से प्रसिद्ध शिला सम्पूर्ण पापों को नष्ट करने वाली हो।  इस गारूडीशिला का स्मरण चिन्तन करनेवाले पुरूषों, प्राणियों की समस्त व्याधियों का शमन हो तथा किसी को कोई दुःख बीमारी न हो।  यह वरदान दें!

ततः प्रभृति त्रैलोक्ये गारूडीति शिलोच्यते।।
(वैष्णवखण्ड, बदरी मा0- 4/28)

उसी दिन से तीनों लोकों में यह शिला, गारूडीशिला के नाम से प्रसिद्ध हुई।

नारद शिला

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नरदो भगर्वास्तेपे तपः परम दारूणाम्।
दर्शनार्थ महाविष्णोः शिलायां वायु भोजनः।।

तप्तकुण्ड और नारदकुण्ड के मध्य में नारद शिला स्थित है, इस नारद शिला पर नारद जी ने भगवान के दर्शनों की इच्छा से 60 हजार वर्ष तक तप किया था।  नारदजी की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वृद्ध ब्राह्मण के रूप में भगवान ने उन्हें दर्शन दिये।  तब नारद जी ने पूछा-’’हे प्रभो! आप इस निर्जन वन में कैसे आये?  आप कौन है?’’ तब भगवान ने अपना चतुर्भुज रूप दिखाया।  भगवान के दर्शन पाकर नारद जी आनन्द में विभोर होकर उनकी स्तुति करने लगे।  उनके तप से तथा उनकी प्रेममयी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान ने उनसे वर माँगने को कहा।

  नारदजी ने दीनता के साथ तीन वर माँगे- (1) आपके चरणों में मेरी अचला भक्ति रहे। (2) मेरी शिला के समीप आपकी स्थिति सदा रहे। (3) जो मेरे इस तीर्थ का दर्शन करें, इसमें स्नान करें, या आचमन करे अथवा पूजन करे उसे फिर मनुष्य देह प्राप्त हो।’’
भगवान ने तीनों वर दिये।  तभी से इस शिला का नाम नारद शिला और इस कुण्ड का नाम नारद कुण्ड पड़ा।  भगवान की वर्तमान मूर्ति इसी नारद कुण्ड से निकाल कर स्थापित की गई है।

भगवान द्वारा इस शिला पर प्रकट होने से यह नारदीय शिला भी अत्यन्त पवित्र और पुण्यदायक हो गयी।  इस शिला के पूजन से भगवान की भक्ति प्राप्त होती है।