Badrinath Dham

 

तीर्थ पुरोहित

भारतीय धार्मिक सन्दर्भ में पुरोहित का अर्थ परिवार के पुजारी से है।  जिन्हे पंडित शब्द से भी सम्बोधित किया जाता है। तीर्थ पुरोहित का तात्पर्य उन पुरोहितों से है जो गंगा किनारे रहते है और प्राचीन समय से ही हिन्दू परिवारों के अभिलेखों का रख-रखाव करते है।

धाम में पंडों का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है आठवी सदी में जब आदि गुरू शंकराचार्य बद्रिकाश्रम क्षेत्र में आये तो उनके साथ विभिन्न जातियों के दक्षिण भारतीय ब्राहमण भी आये जो तेत्रिया कृष्ण यजुर ब्राहमण थे।

इनकी बुद्धीमता से प्रभावित होकर गढ़वाल के राजा ने देवप्रयाग में स्थित रघुनाथ मन्दिर की पूजा अर्चना का कार्यभार इन्हे दिया।  जब ये बद्रीनाथ में आये तो यात्रियों के द्वारा इनको पूजित किया गया और सम्मान दिया गया।  तभी से इन्हे बद्रीनाथ धाम का पंडा (पुरोहित) कहा जाने लगा।  तथा सर्वत्र में भी ।

जब तीर्थ यात्री बद्रीनाथ या देवप्रयाग यात्रा पर आते है तो प्रत्येक पंडा (पुरोहित) यात्रा पर आये हुये तीर्थ यात्रियों का विशेष ध्यान रखते है और उनके लिये सम्पूर्ण व्यवस्थाओं का प्रबन्ध करते है, जैसे भोजन, रहना, पूजा अर्चना इत्यादि इनके पास तीर्थ यात्रियों की कई पीढीयों के अभिलेख उपलब्ध रहते है।  ये अभिलेख इनके बही, दसखती इत्यादि में सुरक्षित रहते हे।

देवप्रयाग के तीर्थ पुरोहित छः महीने ब्रदीनाथ धाम में एवं छः महीने देवप्रयाग में निवास करते है।


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