Badrinath Dham

 

उर्वशीकुण्ड - वैखानस नामक श्रेष्ठ तीर्थ- ब्रह्मकुण्ड महातीर्थ

उर्वशीकुण्ड

उर्वशीकुण्डमाख्यातं सर्वसौन्दर्य्यदायकम्। पुरा पुरूरवा यत्र रेमे वत्सरपञचकम्।।
उर्वश्या सह वामाक्षि जनयामास वै सुतान्। अत्र यः पञचरात्रं वै स्नाति भक्तिसमन्वितः।।
कन्दर्प इव रूपाढयो जायते नात्र संशयः। तिस्त्रः कोटयोर्द्धसंयुक्तास्तीर्थान्यत्राश्रमे प्रिये।।

नारद पुराण, वामन पुराण और स्कन्द पुराण सभी में लोकपाल के बाद उर्वशी कुण्ड का वर्णन है। बद्रीनाथ जी के मन्दिर के पीछे से ’’चरणापादुका’’ होकर वहाँ जाने का रास्ता है।

यहीं पर भगवान ने अपनी जंगा से उर्वशी को उत्पन्न किया जिसे देखकर कामदेव, बसन्त, वायु और स्वर्ग की अप्सरायें लज्जित हुई और जो स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी देवागंना हुई।  उसी से इस तीर्थ का निर्माण किया। यहाँ पूर्वकाल में पुरूरवा ने पाँच वर्षों तक उर्वशी के साथ रमण किया था। और उस कुण्ड में जो पाँच रात भक्तित्पूर्वक स्नान करता है, वह कन्दर्प के समान रूपवान होता है, इसमें सन्देह नहीं।

वैखानस नामक श्रेष्ठ तीर्थ

प्रसन्नो धनदो दद्यात्स्पर्शादिदृषदं प्रिये। वैखानसं परं तीर्थं महापापनिवारणम्।।
स्नात्वा फलादिभक्षोत्र जयेन्मृत्युं हि वत्सरात्। शेषतीर्थे महापुण्ये गंगायां स्नाति यो नरः।।

यह तीर्थ महापापों का निवारण करनेवाला है। एक वर्ष तक उसमें स्नान करके फलाहार करने से मनुष्य मृत्यु को जीत लेता है।  गंगा में महापवित्र शेषतीर्थ में जो मनुष्य स्नान करता है, वह इस लोक में उत्तम भोगों को भोगकर मरने पर श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है।

ब्रह्मकुण्ड महातीर्थ

ब्रह्म कुण्डमितिख्यातं त्रिषुलोकेषु विश्रुतम्।।

कपाली के नीचे ब्रह्मकुण्ड है।  इसकी पौराणिक कथा इस प्रकार है कि जब ब्रह्माजी भगवान के नाभि कमल से उत्पन्न हुए तब चारों ओर देखने से उनके चार मुख हो गये।  उन चारों मुखों से स्वतः ही चारों वेदों का गान होने लगा।  उसी समय भगवान के अंग से मधु और कैटभ नाम के दो राक्षस पैदा हुए वे ब्रह्माजी से मूर्तिमान चारों वेदां को लेकर भाग गये। उन्हें आदेश हुआ कि तप करो, इसलिए वे तप करने बदरिकाश्रम में आये।  उनके तप से सन्तुष्ट होकर भगवान हयशीर्षरूप में इस कुंड से उत्पन्न हुए।  तब ब्रह्माजी ने उनकी स्तुति की।  तब ब्रह्माजी की प्रार्थना पर उन दोनों दैत्यों को मारकर भगवान उनसे वेदों को छीन लाये।  यह हमने संक्षेप में कथा कही वेदोद्धार की कई तरह की कई कथायें हैं।  एक हयशीर्ष दैत्य हुआ है, एक शंख्ङासुर दैत्य हुआ है, मधुकैटभ भी दैत्य हुआ है।  इस प्रकार कभी दयशीर्ष रूप से कभी मत्स्यरूप से और कभी विष्णु रूप से वेदों का उद्धार किया है।  तभी से यह ब्रह्म कुण्ड के नाम से तीर्थ विख्यात हुआ।  इसके स्थान के फल के सम्बन्ध में स्कन्ध पुराण में लिखा हैः

यस्य दर्शन मात्रेण महापातकिन्तेजनाः।
विमुक्त किल्विषाः सधो ब्रह्मलोके महीयतेः।।