Badrinath Dham

 

सथूल सृक्ष्म शरीरं त जीवस्य वसतिस्थलम्।
तद् विनाशर्यत् ज्ञाना विशालातेन कथ्यते।।
(स्क0 प. वै. खं. ब. म. 1)

श्री बद्रीपुरी को विशालापुरी भी कहते हैं।  विशाला के पुराणों में कई अर्थ बताये हैं।  स्कन्द पुराण में लिखा है कि वहाँ तीर्थों का, देवताओं का, और ऋषियों का वास है इसलिये इसे विशाला कहा है, किसी समय वहाँ देवता ऋषिगण प्रत्यक्ष निवास करते होंगे ,विशाला नगरी सचमुच ही विशाला है।  देव देखनी से उस पुरी की छटा देखने पर बड़ी ही अद्भुत दिखाई देती है।  नारायण पर्वत पर थोड़ा चढ़ने पर भी विशालापुरी की शोभा बड़ी ही सुन्दर दीखती है।  टेढ़ी-मेढ़ी भगवती अलकनन्दा कलकल करती तेजी से बह रही है उसके किनारे पर ही विशालापुरी की बस्ती है।

बद्रीविशाल (विशालापुरी)

 

बराह पुराण के 48 वें अध्याय में कल्कि द्वादशी के व्रत के सडत्र में राजा विशाल की कथा है। और पुराणों में भी है। उस सम्बन्ध में एक कथा है।
सूर्य वंश में कोई विशाल नाम के राजा थे , उनके शत्रुओं ने उनका राज्य पाट छीन लिया।  युद्ध में पराजित होने पर तथा राज्य पाट के छिन जाने पर राजा बड़े दुखी हुए।  दुःख के कारण गन्ध मादन पर्वत की गुद्दा में बदरीपुरी में तपस्या करने लगे।  उनकी तपस्या से सन्तुष्ट होकर नर नारायण उनके सामने प्रकट हुए।

भगवान ने प्रकट होकर कहा-’’राजन्! हम तुम्हारी तपस्या से सन्तुष्ट हैं तुम जो चाहो वरदान माँगो।’’
राजा ने कहा-’’भगवन्! मैं जानना चाहता हूँ कि आप दोनों वर देने वाले देव श्रेष्ठ कौन हैं।’’
तब नर ने कहा-’’जिन की तुम तपस्या कर रहे हो जिनको प्रसन्न करना चाहते हो वही हम हैं।’’
राजा ने कहा-’’मैं तो विष्णु भगवान की आराधना कर रहा हूँ।
नर ने कहा-’’हम ही विष्णु हैं पृथक-पृथक युगों में हमारे भिन्न भिन्न अवतार हैं। यह अवतार हमारी तपस्या की पद्धति को प्रकट करने के ही निमित्त है।

तब भगवान ने कहा-’’अच्छी बात है राज्य तो तुम्हारा मिल ही जायगा किन्तु हमारी यह पुरी तुम्हारे नाम से विख्यात होगी ओर हमारे नाम के साथ तुम्हारा नाम भी सदा जुडा रहेगा।  जो हमारे नाम के साथ तुम्हारा नाम लेंगे उनको अक्षय पुण्य होगा।  तभी से इस पुरी का नाम विशाला पड़ा।

स्कन्द पुराण में विशालापुरी के चारों युगों के चार नाम बताये हैं सतयुग में ’’मुक्तिप्रदा’’ त्रेता में ’’योगसिद्धिदा’’ द्वापर में ’’विशाला’’ और कलियुग में ’’बदरिकाश्रम’’

कृते मुक्ति प्रदा प्रोक्ता त्रेतायां योगसिद्धिदा।
विशालाद्वापरे प्रोक्ता कलौ बदरिकाश्रमः।।
(स्क0 पु0 क0)